जम्मू‑कश्मीर के मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला ने भारत द्वारा इन्डस जल समझौते (IWT) को निलंबित करने के फैसले का समर्थन किया और कहा कि केंद्र पाकिस्तान की युद्ध‑धृष्टता का जवाब देगा। उन्होंने बताया कि यह समझौता राज्य के जल‑संपदा और ऊर्जा सुरक्षा के खिलाफ है।
जम्मू‑कश्मीर के मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला ने आज दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत के दौरान इन्डस जल समझौते (IWT) को निलंबित करने के भारत के निर्णय को पूरी तरह समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह समझौता 1960 में भारत‑पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित होने के बाद से राज्य के हित में नहीं रहा, और इसका प्रतिकूल प्रभाव जल‑सुरक्षा और ऊर्जा उत्पादन दोनों पर पड़ा है।
समझौते का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
IWT के तहत भारत को रावी, बेास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों के जल का पूरा उपयोग अधिकार मिला, जबकि पाकिस्तान को इन्डस, चेनाब और जहलूम जैसी पश्चिमी नदियों का उपयोग अधिकार दिया गया। यह विभाजन तब की गई थी जब दोनों देशों के बीच जल‑संसाधन पर बहस तीव्र थी, परन्तु जम्मू‑कश्मीर को इस समझौते में सीमित अधिकार ही मिले। समय के साथ जल‑वितरण में असमानता, बुनियादी ढाँचे की कमी और जल‑प्रदूषण ने राज्य को गंभीर जल‑संकट में धकेल दिया।
पहलगाम हमले के बाद निलंबन
2025 में पहलगाम पर हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने IWT को ‘अस्थायी रूप से निलंबित’ कर दिया। सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में बताया, यह तर्क देते हुए कि जल‑संरक्षण के मुद्दे को आतंकवाद के साथ मिलाकर देखना आवश्यक है। इस कदम से जम्मू‑कश्मीर में जल‑संसाधन प्रबंधन पर केंद्र सरकार का सीधा नियंत्रण बढ़ा, जिससे राज्य में जल‑अधिकारों की पुनः समीक्षा की संभावना उत्पन्न हुई।
ओमर अब्दुल्ला का बयान और राजनीतिक प्रभाव
अब्दुल्ला ने स्पष्ट किया कि उनकी राष्ट्रीय कांग्रेस (National Conference) ने हमेशा से IWT का विरोध किया है। उन्होंने कहा, “यदि भारत‑पाकिस्तान के बीच कोई बड़ी धोखा है, तो वह इन्डस जल समझौता है, जिसने जम्मू‑कश्मीर को अपने नदियों पर नियंत्रण से वंचित कर दिया।” उन्होंने इस समझौते को राज्य की वर्तमान बिजली कमी और जल‑अभाव का मुख्य कारण भी बताया। अब्बदुल्ला ने यह भी कहा कि भारत के खिलाफ पाकिस्तान द्वारा जारी युद्ध‑धृष्टता को लेकर केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार किया जाएगा।
भविष्य की संभावनाएँ और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव
इन्डस जल समझौते को निलंबित करने से भारत‑पाकिस्तान के बीच जल‑संबंधों में नई जटिलता आती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों पक्षों में पुनः वार्ता नहीं हुई, तो जल‑संघर्ष और सीमा‑विवाद दोनों बढ़ सकते हैं। वहीं, भारत के लिए यह अवसर है कि वह जम्मू‑कश्मीर में जल‑इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत कर, ऊर्जा उत्पादन और कृषि के लिये स्थायी जल‑स्रोत स्थापित कर सके। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस कदम को ‘स्थिरता बनाम सुरक्षा’ के संतुलन के रूप में देख रहा है, और जल‑सुरक्षा को वैश्विक सुरक्षा एजेंडा में जोड़ रहा है।