भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑस्ट्रेलिया की 16 वर्ष से कम आयु के किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध को सराहा, यह संकेत देते हुए कि भारत भी इसी दिशा में विचार कर रहा है। यह कदम डिजिटल सुरक्षा और बाल संरक्षण पर बढ़ती वैश्विक चर्चा के बीच आया है।

नई दिल्ली – 9 जुलाई 2026 – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑस्ट्रेलिया की किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध को "प्रेरणादायक" बताया, जिससे भारत सरकार के इस क्षेत्र में संभावित कदमों की झलक मिलती है। 9 जुलाई को मेलबोर्न में एक समुदायिक कार्यक्रम के दौरान, मोदी ने ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी एल्बेनेज़ से कहा कि ऑस्ट्रेलिया का "सुरक्षा मॉडल दुनिया के लिए प्रेरणास्रोत" है।

ऑस्ट्रेलिया का मॉडल और भारत की संभावनाएँ

ऑस्ट्रेलिया की 2024 में पारित ऑनलाइन सुरक्षा संशोधन (सामाजिक मीडिया न्यूनतम आयु) अधिनियम के तहत, प्लेटफ़ॉर्मों को 16 वर्ष से कम आयु के उपयोगकर्ताओं को पहचानने और उन्हें पहुँच रोकने का दायित्व है। भारत में इसी तरह की ‘ग्रेडेड’ पाबंदियों पर चर्चा चल रही है, जिसमें कुछ प्रकार की सामग्री को आयु के आधार पर ब्लॉक किया जा सकता है।

कानूनी ढाँचे और राज्य पहल

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने पहले ही बताया था कि सरकार आयु आधारित प्रतिबंधों पर सोशल मीडिया कंपनियों के साथ वार्तालाप कर रही है। अप्रैल में आंध्र प्रदेश और कर्नाटक ने अपनी-अपनी सोशल मीडिया प्रतिबंध विधेयक पर विचार शुरू किया, हालांकि अभी तक किसी ने विधेयक पेश नहीं किया है। भारतीय संघीय सरकार का यह निर्णय अभी भी ‘संसद में कानून’ या ‘इंटरमीडिएरी गाइडलाइन’ नियमों में संशोधन के रूप में सामने आ सकता है।

समीक्षाएँ और चुनौतियाँ

डिजिटल अधिकार वकालत समूह इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने पूर्ण प्रतिबंध का विरोध किया, यह कहते हुए कि सामाजिक मीडिया युवा नागरिक भागीदारी को बढ़ावा देता है। वे तर्क देते हैं कि बेहतर सुरक्षा उपाय और नियामक ढाँचा अपनाकर ही इंटरनेट को सुरक्षित बनाया जा सकता है, बजाय पूर्ण बंद के। दूसरी ओर, भारत के आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया का प्रभाव गंभीर है और आयु आधारित नियंत्रण आवश्यक है।

भविष्य की दिशा

मॉदी का बयान वैश्विक स्तर पर डिजिटल सुरक्षा के प्रति भारत की बढ़ती जागरूकता को दर्शाता है। यदि भारत इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो यह न केवल घरेलू नीतिगत बदलाव का संकेत देगा, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी डिजिटल शिशु संरक्षण के मानक स्थापित करने की दिशा में एक कदम होगा।