सतलुज बायोपिक को ZEE5 से हटाए जाने के बाद भारत सरकार सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम में बदलाव कर सभी सार्वजनिक दर्शकों के लिए उपलब्ध फिल्मों को सर्टिफ़िकेशन अनिवार्य करने की सोच रही है। यह कदम फ़िल्म सेंसॉरशिप, राज्य सुरक्षा और आगामी पंजाब विधानसभा चुनावों के बीच जटिल राजनीतिक समीकरण को फिर से आकार देगा।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • सतलुज फिल्म को OTT प्लेटफ़ॉर्म ZEE5 से हटाया गया।
  • केंद्रीय सरकार IT अधिनियम में बदलाव कर सभी सार्वजनिक प्रदर्शित फ़िल्मों को सर्टिफ़िकेशन अनिवार्य करना चाहती है।
  • यह कदम राजनीति, सुरक्षा और सेंसरशिप के बीच नई बहस को जन्म देगा।

नई दिल्ली – पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खलरा की जीवनी पर आधारित बायोपिक सतलुज को पिछले सप्ताह ZEE5 से हटाया गया, जिससे केंद्र सरकार को सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम में संशोधन की आवश्यकता पर पुनः विचार करने का दबाव बना। इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि OTT, स्ट्रीमिंग या किसी भी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध फ़िल्में, चाहे वे थियेटर रिलीज़ के लिए न बनी हों, को सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सर्टिफ़िकेशन (CBFC) की मंज़ूरी अनिवार्य हो।

पृष्ठभूमि और कानूनी जटिलताएँ

सतलुज, पहले जिसका शीर्षक “Punjab ’95” था, ने CBFC द्वारा सुझाए गए 127 कट्स को अस्वीकार कर थियेटर रिलीज़ नहीं देखी। फ़िल्म निर्माताओं ने 2022 में सर्टिफ़िकेशन बोर्ड के सामने अपना मामला रखा, 2023 में बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी, परन्तु अंततः याचिका वापस ले ली। कोर्ट ने जनवरी 2025 में इस मामले को निपटा दिया, और तब से फ़िल्म निर्माताओं ने CBFC के साथ कोई समाधान नहीं किया। इस बीच, ZEE5 ने जुलाई 3 को बिना कट्स के “सतलुज” नाम से फ़िल्म लॉन्च की, लेकिन दो दिन बाद “वर्तमान परिस्थितियों” का हवाला देकर उसे हटाया।

राजनीतिक परिप्रेक्ष्य

फ़िल्म का हटाया जाना पंजाब के चुनावी माहौल में नई लहरें पैदा कर चुका है। वर्तमान में विधानसभा चुनावों की तैयारी चल रही है; अंबेडकर अडवांस्ड पार्टी (AAP) ने इस कदम को केंद्र सरकार की दखलंदाज़ी के रूप में उजागर किया, जबकि शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने फ़िल्म को ग्रामीण स्तर पर प्रदर्शित कर सिख समुदाय के विरुद्ध कांग्रेस शासन के अत्याचारों को उजागर करने का इरादा जताया। इस प्रकार, सर्टिफ़िकेशन की अनिवार्यता पर प्रस्ताव न केवल कानूनी बल्कि चुनावी रणनीति का भी हिस्सा बन गया है।

सुरक्षा और सामाजिक प्रभाव

सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि पंजाब की संवेदनशील सीमा स्थितियों, खालिस्तान-सम्बंधित प्रोपेगैंडा और विदेश‑आधारित अलगाववादी आंदोलनों को देखते हुए, ऐसी फ़िल्में “जो राज्य को दमनकारी रूप में दर्शाती हैं” का दुरुपयोग संभावित है। वे तर्क देते हैं कि OTT प्लेटफ़ॉर्म पर भावनात्मक रूप से चार्ज्ड कंटेंट युवा वर्ग और प्रवासी समुदाय में असंतोष को फिर से उभारा सकता है, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। इस कारण से, सभी सार्वजनिक दर्शकों के लिए उपलब्ध सामग्री को सर्टिफ़िकेशन द्वारा नियंत्रित करने की मांग को राष्ट्रीय सुरक्षा के एक पहलू के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

आगे का मार्गदर्शन

यदि केंद्र सरकार IT अधिनियम में संशोधन को पारित करती है, तो OTT प्लेटफ़ॉर्म, डिजिटल स्ट्रीमिंग सेवाएँ और यहाँ तक कि यू‑ट्यूब जैसे यूज़र‑जेनरेटेड कंटेंट साइटें भी CBFC के नियमों के अधीन होंगी। यह कदम भारतीय फ़िल्म उद्योग के डिजिटल परिवर्तन को पुनः आकार देगा, साथ ही सेंसॉरशिप के दायरे को व्यापक बनाते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नई सीमाएँ खींचेगा। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल “डिजिटल सॉफ़्ट‑पॉवर” की लड़ाई में सरकार की सक्रिय भूमिका को दर्शाती है, परन्तु यह भी सवाल उठाता है कि क्या यह संतुलित नियमन है या अभिव्यक्ति पर अनुचित प्रतिबंध।