असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने उल्फा (I) के प्रमुख प्रशा बरुआ को समर्थन देते हुए चे ग्वेरा की तुलना में ज़ुबीन गार्ग की दीवार चित्रकला पर प्रतिबंध की बात कही। इस विवाद ने असम की सांस्कृतिक पहचान, आतंकवाद और राष्ट्रीय राजनीति के बीच जटिल संबंधों को उजागर किया है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- असम के सीएम ने उल्फा (I) के प्रमुख को एक ‘क्रांतिकारी’ मानते हुए समर्थन किया।
- ज़ुबीन गार्ग की दीवार चित्रकला को केवल पत्नी की मान्यता प्राप्त पोर्ट्रेट तक सीमित करने की चेतावनी दी गई।
- इस बयान से भारतीय राष्ट्रीयता, क्षेत्रीय पहचान और आतंकवादी समूहों के बीच तनाव बढ़ा।
गुवाहाटी में एक फ्लाईओवर पर चे ग्वेरा शैली में बनायी गई ज़ुबीन गार्ग की मूल पेंटिंग को हटाने के बाद, असम के मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अगर क्रांतिकारी चित्र बनाना है तो वह उल्फा (I) के प्रमुख प्रशा बरुआ को चुने। यह टिप्पणी असम की सांस्कृतिक प्रतीक ज़ुबीन गार्ग के प्रति जनता के गहन सम्मान और एक बिखरते हुए विद्रोही समूह के प्रति राजनैतिक बारीकियों को एक साथ लाती है।
पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ
ज़ुबीन गार्ग, जो 2025 में सिंगापुर में डूबते समय मार गये, असम में लगभग पौराणिक स्तर पर पूजित होते हैं। उनकी मृत्यु के बाद राज्य में लाखों लोगों ने शोक मनाया, और उनकी मूल पेंटिंग को “सौंदर्यीकरण” के नाम पर हटाना कई लोगों को आहत कर गया। साथ ही, उल्फा (I) 1980‑90 के दशक में असम में सैकड़ों हत्याओं के लिए जिम्मेदार था, जबकि आज भी यह समूह सीमित क्षेत्रों में सक्रिय है।
राजनीतिक आयाम
हिमंत बिस्वा सरमा ने इस विवाद में उल्फा के प्रमुख को “30 साल से संघर्षरत” कह कर समर्थन दिया, यह संकेत देते हुए कि असम के भीतर स्थानीय “क्रांतिकारी” को राष्ट्रीय पहचान के रूप में प्रदर्शित किया जाना चाहिए। यह बात असाम के कई राष्ट्रीय दलों और सुरक्षा एजेंसियों को असहज करती है, क्योंकि यह राज्य सरकार को एक बगावत समूह के नेता को वैधता प्रदान करने के रूप में देखा जा सकता है।
सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभाव
सरमा ने ज़ुबीन की पेंटिंग को केवल उनकी पत्नी गारिमा सैकिया गार्ग की स्वीकृत पोर्ट्रेट तक सीमित करने का प्रस्ताव रखा। यह कदम कलाकारों की रचनात्मक स्वतंत्रता को सीमित करता है और एक संभावित सेंसरशिप के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही, यह बयान असम के युवा वर्ग के बीच अंतरराष्ट्रीय प्रतीकों, जैसे चे ग्वेरा, के प्रति आकर्षण को चुनौती देता है।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि सरकार इस तरह के बयान जारी रखती है, तो असम में राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच नया संघर्ष उभर सकता है। यह भी संभव है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे को लेकर असम में अधिक कड़ी निगरानी और संभावित हस्तक्षेप का विकल्प चुन सकती है।