CPI(M) ने अंध्र प्रदेश सरकार पर पिछले दो वर्षों में उपभोक्ताओं पर 21,885 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ डाला होने का आरोप लगाया है। सरकार द्वारा 2026 से केवल 13 पैसे प्रति इकाई की कटौती को टैरिफ राहत का दिखावा माना गया है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- CPI(M) ने 21,885 करोड़ रुपये का छुपा भार उजागर किया
- सरकार 2026 से केवल 13 पैसे/इकाई की कटौती का वादा कर रही है
- CPI(M) ने समायोजन शुल्क हटाने और स्मार्ट मीटर वापस लेने की मांग की
अंध्र प्रदेश में बिजली की टैरिफ नीति को लेकर फिर से जलवायु उभरी है, जब सीपीआई (एम) ने राज्य सरकार पर दो साल में उपभोक्ताओं पर 21,885 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ डालने का आरोप लगाया। पार्टी के राज्य सचिवालय सदस्य च. बाबू राव ने बताया कि सरकार ने टैरिफ में 52 पैसे प्रति इकाई की कटौती का दावा किया, परन्तु वास्तविक में समायोजन शुल्क 62 पैसे से लेकर 1.88 रुपये प्रति इकाई तक बरकरार रहे।
पृष्ठभूमि
अंध्र प्रदेश सरकार ने 2024 में एक दो‑साल का रिपोर्ट जारी किया, जिसमें कहा गया कि बिजली की कीमतों में कमी आई है। यह रिपोर्ट चुनावी माहौल में जारी हुई, जब विपक्षी दलों ने ऊर्जा नीति को लेकर प्रश्न उठाए थे। हालांकि, सीपीआई (एम) के अनुसार, इस रिपोर्ट में कई प्रमुख आंकड़े छुपाए गए हैं, विशेषकर समायोजन शुल्क और स्मार्ट मीटर की लागत।
वित्तीय प्रभाव
बाबू राव के अनुसार, 2022‑23 में उपभोक्ताओं ने 6,072 करोड़ रुपये का ट्रू‑अप शुल्क, 2023‑24 में 9,412 करोड़ रुपये और 2014‑19 के लिए 1,400 करोड़ रुपये चुकाए। अतिरिक्त 40 पैसे प्रति इकाई के लेवी के तहत लगभग 5,000 करोड़ रुपये और जुड़े हुए चार्जेस ने कुल बोझ को 21,885 करोड़ रुपये तक पहुँचाया। यह रकम सरकारी सब्सिडी में देरी और वितरण कंपनियों को भुगतान न होने के कारण और बढ़ी।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
सीपीआई (एम) ने सरकार की इस नीति को ‘धोखेबाज़ी’ करार दिया और सार्वजनिक बहस की माँग की। उन्होंने कहा कि स्मार्ट मीटर की स्थापना चुनाव से पहले विरोध किया गया था, फिर भी सरकार ने इसे जारी रखा। इसके अलावा, अडानी‑SECI सौर ऊर्जा समझौते में भ्रष्टाचार के आरोपों पर कोई जांच नहीं की गई, इसे भी उन्होंने उजागर किया।
भविष्य की संभावनाएँ
पार्टी ने सरकार से तुरंत समायोजन शुल्क समाप्त करने, टैरिफ को 52 पैसे प्रति इकाई तक घटाने, स्मार्ट मीटर की स्थापना रोकने और पहले स्थापित मीटरों को हटाने की मांग की है। उन्होंने राज्य स्तर पर व्यापक विरोध प्रदर्शन जारी रखने का संकल्प भी व्यक्त किया। यदि यह मांगें पूरी नहीं हुईं, तो उपभोक्ताओं पर आर्थिक दबाव बढ़ता रहेगा और राजनीतिक तनाव और गहरा हो सकता है।
सारांश में, एपी सरकार की ऊर्जा नीति पर विवाद केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक आयामों को भी छू रहा है, जो आगामी चुनावी माहौल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।