एक जनहित याचिका ने सुप्रीम कोर्ट में 20% एथेनॉल (E20) मिश्रित पेट्रोल की बिक्री को पारदर्शिता के बिना उपभोक्ता अधिकारों का हनन कहा। याचिकाकर्ता ईंधन में एथेनॉल प्रतिशत की सूचना, नोजल लेबलिंग और पुराने वाहनों के लिए सादे पेट्रोल की विकल्प की मांग कर रहे हैं।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- E20 मिश्रित पेट्रोल की बिक्री में पारदर्शिता की कमी
- पुरानी गाड़ियों के लिए सादे पेट्रोल का विकल्प आवश्यक
- नोजल और रसीद पर एथेनॉल प्रतिशत दर्शाने का प्रस्ताव
नई दिल्ली (10 जुलाई 2026) – सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें 20% एथेनॉल (E20) मिश्रित पेट्रोल को बिना स्पष्ट सूचना के बेचना उपभोक्ताओं के अधिकारों का हनन माना गया है। इस याचिका को अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा ने प्रस्तुत किया, जिसमें ईंधन में एथेनॉल की मात्रा को नोजल और रसीद दोनों पर स्पष्ट रूप से दर्शाने की मांग की गई है।
पृष्ठभूमि और नीति का इतिहास
भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में पर्यावरणीय कारणों से एथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दिया है। प्रारम्भ में E5 (5% एथेनॉल) से शुरू होकर, 2023 में E10 और 2025 में E20 का लक्ष्य रखा गया। इस नीति का मुख्य उद्देश्य जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाना और कृषि क्षेत्र को समर्थन देना था। परन्तु, कई पुराने मॉडल के वाहन, विशेषकर 1995‑2005 के निर्माताओं के, ईंधन प्रणाली में एथेनॉल के उच्च प्रतिशत से प्रभावित हो सकते हैं, जिससे माइलेज घटना और इंजन में अतिरिक्त घिसाव की आशंका रहती है।
याचिका के मुख्य बिंदु
याचिकाकर्ता का कहना है कि हर पेट्रोल पंप पर नोजल पर एथेनॉल प्रतिशत का स्पष्ट लेबल और रसीद में समान जानकारी अनिवार्य होनी चाहिए। इसके अलावा, पुराने वाहनों के मालिकों को सादे पेट्रोल (शुद्ध पेट्रोल) का विकल्प प्रदान करने की भी मांग की गई है। याचिका यह स्पष्ट करती है कि यह सरकार की एथेनॉल‑प्रोत्साहन नीति का विरोध नहीं करती, बल्कि उपयोगकर्ता सुरक्षा और पारदर्शिता का आग्रह करती है।
संभावित प्रभाव और आगे की राह
यदि कोर्ट इस याचिका को स्वीकार करता है, तो पेट्रोल पंपों को नयी लेबलिंग प्रणाली अपनानी पड़ेगी, जिससे परिचालन लागत में वृद्धि हो सकती है। साथ ही, मोटर वाहन मंत्रालय को पुराने वाहनों के लिए वैकल्पिक ईंधन नीति तैयार करनी पड़ेगी, जिससे वाहन निर्माताओं और उपभोक्ताओं दोनों को लाभ हो सकता है। पर्यावरणीय दृष्टिकोण से, यह कदम एथेनॉल ब्लेंडिंग को निरंतर जारी रखने के साथ-साथ उपभोक्ता सुरक्षा को संतुलित करने का एक मॉडल पेश कर सकता है।
विश्लेषक राय
विधायी विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता के बिना किसी भी नई ईंधन नीति को लागू करना दीर्घकालिक विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकता है। इस याचिका से यह संकेत मिलता है कि नीति निर्माताओं को तकनीकी और उपभोक्ता दोनों पहलुओं को समग्र रूप से देखना आवश्यक है।