नासिक सेंट्रल जेल में दो आजीवन सजा के साथ बंद अबू सालेम को 16.51 लाख रुपए का जुर्माना बाकी है। अदालत से यह स्पष्ट करने की याचिका दायर की गई है कि यदि जुर्माना नहीं दिया गया तो अतिरिक्त 18 साल की सजा लागू होगी या नहीं।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- अबू सालेम नासिक सेंट्रल जेल में दो आजीवन सजा काट रहे हैं।
- 16.51 लाख रुपए का बकाया जुर्माना न चुकाए जाने पर अतिरिक्त 18 साल की सजा लग सकती है।
- 25 साल की प्रत्यर्पण शर्त के तहत जुर्माना माफ़ किया जा सकता है या नहीं, इस पर अदालत से स्पष्टता माँगी गई है।
अबू सालेम वर्तमान में नासिक सेंट्रल जेल में बंद हैं, जहाँ वह 1993 के ध्वंसकाण्ड और बिल्डर प्रदीप जैन की हत्या के दो अलग‑अलग मामलों में आजीवन कारावास काट रहे हैं। दोनों मामलों में विशेष अदालत ने 2015 और 2017 में उन्हें सजा सुनाई थी।
पृष्ठभूमि
सालेम को 2005 में पुर्तगाल से प्रत्यर्पित किया गया था, जब भारत ने पोर्तुगाल को आश्वासन दिया था कि उन्हें मृत्युदंड या 25 साल से अधिक की सजा नहीं दी जाएगी। यह शर्त सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में पुष्टि की और कहा कि 2030 में सजा समाप्ति पर फिर से समीक्षा की जाएगी। हालांकि, जुर्माने के संबंध में कोई स्पष्ट दिशा‑निर्देश नहीं दिया गया था।
अभियोजन और दंड
टेररिज़्म और डिसरप्टिव एक्ट (TADA) के तहत सालेम को दो अलग जुर्माने का आदेश दिया गया: एक में 8 लाख रुपये और दूसरे में 8.51 लाख रुपये। यदि यह जुर्माना नहीं चुकाया गया तो 8 साल और 10 साल, साथ ही छह महीने की अतिरिक्त सजा लगनी थी। वर्तमान में कुल बकाया 16.51 लाख रुपये है, जिसे लेकर जेल प्रशासन ने अदालत में स्पष्टता की मांग की है।
कानूनी पहलू
जेल ने राइट टू इन्फॉर्मेशन अधिनियम के तहत कई पूछताछ की हैं, यह जानने के लिये कि क्या जुर्माने को माफ़ किया जा सकता है या डिफ़ॉल्ट सजा लागू होगी। सालेम ने भी एक पत्र में कहा है कि जेल से जुर्माने के भुगतान के बारे में उचित जानकारी नहीं मिली है। उन्होंने यह भी कहा कि 11 जुलाई 2022 को सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश में जुर्माने का कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए उन्हें केवल 25 साल की सजा पूरी करनी चाहिए।
संभावित प्रभाव
यदि अदालत यह तय करती है कि जुर्माने का भुगतान अनिवार्य है, तो सालेम को अतिरिक्त 18 साल की सजा का सामना करना पड़ेगा, जिससे भारत‑पुर्तगाल के प्रत्यर्पण समझौते पर प्रश्न उठेंगे। दूसरी ओर, यदि जुर्माना माफ़ किया जाता है, तो यह भविष्य में अन्य प्रत्यर्पित अपराधियों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल स्थापित कर सकता है।
यह मामला न केवल भारतीय न्याय प्रणाली की पारदर्शिता को परख रहा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय प्रत्यर्पण समझौतों के पालन में भी नई दिशा तय कर सकता है।