वाइस प्रेसिडेंट सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि बिहार ने 1975‑77 के आपातकाल में स्वतंत्रता संग्राम का दूसरा चरण नेतृत्व किया, जिससे राज्य की ऐतिहासिक भूमिका उजागर हुई। उन्होंने प्रदेश के विधायक सांसदों को डिजिटल युग में तकनीकी समझ बढ़ाने का आह्वान किया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- बिहार ने 1975‑77 के आपातकाल में दूसरे स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया
- ज्येष्ठ नेता जैसे जयप्रकाश नारायण, करपूरी ठाकुर और राजेंद्र प्रसाद सिंह ने सामाजिक सुधार में योगदान दिया
- वाइस प्रेसिडेंट ने विधायकों को एआई और डिजिटल उपकरणों से लैस होने की सलाह दी
पटना – 11 जुलाई, 2026 को गयाजी जिले में दो‑दिन की विधान सभा अभिमुखीकरण कार्यक्रम की उद्घाटन बैठक में भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि बिहार ने न केवल स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई, बल्कि आपातकाल के दौरान ‘दूसरा स्वतंत्रता आंदोलन’ भी इस राज्य ने आगे बढ़ाया। इस बयान ने इतिहासकारों और राजनेताओं के बीच व्यापक चर्चा को जन्म दिया।
आपातकाल का संक्षिप्त इतिहास
25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक भारत को अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल में रखा गया था। इस अवधि में मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध, प्रेस सेंसरशिप और कई राजनीतिक नेताओं की जमानतें रद्द कर दी गईं। यह समय भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण माना जाता है, और इस दौरान कई राज्य ने विरोध के रूप में ‘दूसरा स्वतंत्रता संग्राम’ चलाया।
बिहार की अग्रणी भूमिका
बिहार ने इस संघर्ष में विशेष रूप से प्रमुख भूमिका निभाई। उस समय के छात्र नेता, भविष्य के राष्ट्रीय राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता जवाहरलाल नेहरू के प्रत्यक्ष सहयोगी जयप्रकाश नारायण ने ‘जपी आंदोलन’ का नेतृत्व किया, जिसने आपातकाल को समाप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। राधाकृष्णन ने इस आंदोलन में अपने कॉलेज के दिनों में भाग लेने का उल्लेख करके बताया कि यह अनुभव उनके राजनीतिक सफर को गहराई से आकार दिया।
प्रमुख बौद्धिक और सामाजिक व्यक्तित्व
बिहार ने कई प्रकाशमान व्यक्तियों को जन्म दिया है, जिनमें राजेंद्र प्रसाद सिंह, करपूरी ठाकुर और कई अन्य सामाजिक सुधारक शामिल हैं। इन व्यक्तियों ने न केवल आपातकाल के विरोध में भाग लिया, बल्कि गरीबी‑सम्पन्न वर्गों के उत्थान के लिए निरंतर प्रयास किया। राधाकृष्णन ने कहा, “विधान चुनाव पार्टी रेखा पर होते हैं, परंतु चुनावों के बाद हमें सामूहिक रूप से जनता की भलाई और विकास के लिए काम करना चाहिए।”
डिजिटल युग में विधायकों की जिम्मेदारी
उपराष्ट्रपति ने यह भी रेखांकित किया कि आज का भारत एक डिजिटल युग में प्रवेश कर चुका है। उन्होंने सभी विधायकों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और अन्य उभरती तकनीकों के साथ अद्यतित रहने का आग्रह किया, जिससे विधायी प्रक्रियाओं की दक्षता और पारदर्शिता बढ़े। इस दिशा में बिहार सरकार ने पहले ही कई डिजिटल पहलों की शुरुआत की है, जो अन्य राज्यों के लिए मॉडल बन सकती हैं।
राधाकृष्णन के इस भाषण ने बिहार के इतिहास को पुनः मान्य करने के साथ-साथ वर्तमान में तकनीकी उन्नति के महत्व को भी रेखांकित किया। यह संदेश न केवल राज्य के विधायकों के लिये, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरक संकेत है कि लोकतांत्रिक संघर्ष और तकनीकी प्रगति दोनों ही विकास के दो अभिन्न स्तंभ हैं।