राज्य सरकार द्वारा मायसूरू दशहरा के कार्यक्रम में किनारा कर्नाटक के पारम्परिक कम्बला दौड़ को शामिल करने के प्रस्ताव ने विपक्षी नेताओं और राजपरिवार की कड़ी प्रतिक्रिया को जन्म दिया है। दोनों सांस्कृतिक परम्पराओं को अलग‑अलग क्षेत्रों में संरक्षित रखने की मांग सामने आई है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- कम्बला को मायसूरू दशहरा में शामिल करने का सरकारी प्रस्ताव
- बी.वाई. विजयेंद्र, यदुवीर वाडियर और एच.डी. कुमारस्वामी सहित विपक्षी नेताओं ने स्पष्ट विरोध जताया
- परम्परागत सांस्कृतिक पहचान को अलग‑अलग क्षेत्रों में संरक्षित रखने की माँग प्रमुख मुद्दा बन गया
केरल के किनारे पर स्थित कर्नाटक के पारम्परिक कम्बला दौड़ को इस साल के मायसूरू दशहरा में एक नई आकर्षण के रूप में पेश करने का राज्य सरकार का प्रस्ताव, राजनीतिक माहौल को तीव्र कर चुका है। विपक्षी दलों ने इस कदम को मायसूरू दशहरा की विशिष्ट ऐतिहासिक और राजसी परम्परा के विरुद्ध माना है, जबकि सरकार इसे सांस्कृतिक विविधता को उजागर करने का प्रयास बताती है।
पृष्ठभूमि और इतिहास
मायसूरू दशहरा, जो 400 से अधिक वर्षों से राजदरबार की शान के रूप में मनाया जाता है, अपने भव्य परेड, जौहर और शाही आभूषणों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। दूसरी ओर, कम्बला दक्षिण कर्नाटक के तटीय जिलों में खेती‑पर्यटन के हिस्से के रूप में विकसित हुई एक जल‑भरे बैल दौड़ है, जो स्थानीय जनजातियों और कृषि समुदाय की धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। दोनों ही कार्यक्रम राज्य की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग हैं, परन्तु उनके भौगोलिक और सामाजिक संदर्भ अलग‑अलग हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
मायसूरू में शनिवार को पत्रकारों से बात करते हुए राज्य बी.वाई. विजयेंद्र ने कहा, “मायसूरू दशहरा की अपनी पहचान और विरासत है, जिसे सरकार को सुरक्षित रखना चाहिए।” उन्होंने यह भी बताया कि मायसूरू के राजपरिवार के प्रतिनिधि यदुवीर कृष्णदत्त चमराजा वाडियर ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को अपने अभिप्राय व्यक्त किए। वाडियर ने कहा, “यदि कम्बला को केवल एक नई आकर्षण के रूप में पेश किया जाये तो यह आवश्यक नहीं है; हमें परम्पराओं की पवित्रता का सम्मान करना चाहिए।”
केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने भी समान रुख अपनाते हुए कहा, “कम्बला तटीय कर्नाटक की सांस्कृतिक धरोहर है, इसे मायसूरू में लाने से उसकी पवित्रता पर प्रश्न उठ सकते हैं।” उन्होंने तटीय क्षेत्रों की हरित जल‑भरी धरती को इस खेल के आदर्श मंच के रूप में उल्लेख किया।
भविष्य की संभावनाएं
विजयेंद्र ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार कम्बला को दक्षिण कर्नाटक के डाक्शिणा कन्नड़ या अन्य तटीय जिलों में बड़े पैमाने पर आयोजित करने का निर्णय लेती है, तो बी.पी.पी. पूर्ण सहयोग देगा। इस बीच, राज्य सरकार को “नए कार्यक्रमों पर व्यापक चर्चा” करने और “प्रेसिडेंट पहल” के रूप में इस प्रस्ताव को पुनर्विचार करने का दबाव बढ़ रहा है। राजनीतिक माहौल के साथ-साथ जनता में भी इस मुद्दे पर विविध राय देखी जा रही है, जहाँ कुछ लोग सांस्कृतिक संगम को स्वागत करते हैं, जबकि अन्य परम्परागत पहचान की रक्षा की वकालत कर रहे हैं।
जैसे ही दशहरा की उच्च शक्ति समिति में इस प्रस्ताव पर चर्चा हुई, यह स्पष्ट हो गया कि इस वर्ष का मायसूरू दशहरा, राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों मोर्चों पर एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।