सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अधिकांश हिंदू कानून 'मनुस्मृति' से नहीं बल्कि 'मीताक्षर' विद्यालय से निकला है, जो यज्ञवल्क्य स्मृति पर आधारित है। उन्होंने दो प्रमुख विद्यालय‑विचार‑धाराओं – मीताक्षर और दायाभाग – के इतिहास व वर्तमान प्रभाव पर प्रकाश डाला।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • हिंदू व्यक्तिगत कानून मुख्यतः मीताक्षर विद्यालय पर आधारित है, न कि मनुस्मृति पर।
  • मीताक्षर और दायाभाग दो अलग‑अलग उत्तराधिकार सिद्धांतों को दर्शाते हैं।
  • परम्परागत नियमों को संसद ने 1955 के हिन्दू वैवाहिक कानून में सम्मिलित किया है।

नई दिल्ली – सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शनिवार को ‘प्राचीन ज्ञान एवं कानूनी बुद्दी’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि हिंदू कानून को ‘मनुस्मृति’ से जोड़ना एक व्यापक भ्रांति है। उनका मानना है कि भारत के अधिकांश हिस्सों में ‘मीताक्षर’ विद्यालय का अनुसरण किया जाता है, जो यज्ञवल्क्य स्मृति पर आधारित है, न कि प्राचीन विधि ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ पर।

हिंदू व्यक्तिगत कानून का ऐतिहासिक विकास

हिंदू वैवाहिक और उत्तराधिकार कानून की जड़ें सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व से भी पहले की हैं। दो प्रमुख विद्यालय उभरे: मीताक्षर और दायाभाग। मीताक्षर विद्यालय की स्थापना विष्णुसेन (विज्ञेश्वर) ने की और यह यज्ञवल्क्य स्मृति के सिद्धांतों पर आधारित है, जो जन्म से ही उत्तराधिकार का अधिकार प्रदान करता है। दूसरी ओर, दायाभाग विद्यालय, जो मुख्यतः बंगाल और असम में प्रचलित था, उत्तराधिकार को केवल ‘पिंडदान’ (श्राद्ध) करने वाले लोगों तक सीमित करता था, जिससे उसकी व्याख्या अधिक प्रतिबंधात्मक रही।

मीताक्षर बनाम दायाभाग: मूलभूत अंतर

मीताक्षर प्रणाली में ‘सहभ्राता’ (कॉपरसेनर) को जन्म से ही संपत्ति का अधिकार मिलता है, जबकि दायाभाग में यह अधिकार केवल शारीरिक संबंध या पिंडदान के बाद ही मान्य होता है। मेहता ने बताया कि दायाभाग की यह पिंड‑आधारित व्याख्या आधुनिक DNA‑जैसे ‘पिंड’ की अवधारणा से तुलना करके समझी जा सकती है, परन्तु यह व्यावहारिक रूप से बहुत सीमित है। इस कारण मीताक्षर प्रणाली को अधिक उदार और गतिशील माना जाता है।

संसदीय कोडिंग और आधुनिक व्याख्या

भारत सरकार ने 1955 में पार्लियामेंट द्वारा ‘हिंदू वैवाहिक कानून’ को कोडित किया, जिसमें प्राचीन शास्त्रों द्वारा निर्धारित ‘प्रतिबंधित सम्बन्ध’ को स्पष्ट रूप से सम्मिलित किया गया। मेहता ने इस कोडिंग को ‘प्राचीन बुद्धिमत्ता’ की प्रशंसा के रूप में प्रस्तुत किया और कहा कि यह नियम आज भी भारतीय परिवारों में उत्तराधिकार एवं विवाह के मूल सिद्धांतों को नियंत्रित करता है। उन्होंने यह भी बताया कि अपनाने के अधिकार की चार प्रमुख व्याख्याएँ मौजूद हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि शास्त्र आधारित कानूनों को समय के साथ पुनः व्याख्यायित किया जा सकता है।

भविष्य में संभावित प्रभाव

मेहता के इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय न्यायालय और विधायी निकाय अब ‘मनुस्मृति’ के नाम पर कठोर व्याख्या नहीं करेंगे, बल्कि ‘मीताक्षर’ के लचीले सिद्धांतों को प्राथमिकता देंगे। यह दृष्टिकोण संभावित कानूनी सुधारों, विशेषकर उत्तराधिकार और अपनाने के मामलों में, सामाजिक न्याय एवं लैंगिक समानता को बढ़ावा दे सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की स्पष्टता से भविष्य में विवादों की संख्या घट सकती है और न्यायिक प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बन सकती है।