जम्मू और कश्मीर में शहीद दिवस के अवसर पर पीपीडी के प्रमुख मेहबूबा मुल्तानी को घर में हिरासत में रखा गया, जैसा कि उनकी बेटी इल्तिजा ने X पर कहा। यह कदम स्थानीय प्रशासन और पुलिस की नीतियों पर नई सवालें उठाता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- मेहबूबा मुल्तानी को शहीद दिवस की पूर्व संध्या पर घर में हिरासत में रखा गया।
- उनकी बेटी इल्तिजा ने X पर यह दावा सार्वजनिक किया।
- जम्मू‑कश्मीर में राजनीतिक दमन और डर की भावना पर नई चिंता उत्पन्न हुई।
जम्मू और कश्मीर में 13 जुलाई को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो 1931 में डोगरा सेना द्वारा श्रीनगर के सेंट्रल जेल के बाहर 22 कैदियों की हत्या की याद में स्थापित किया गया था। यह दिन 2020 में केंद्र शासित प्रदेश के लैटिन-जनरल प्रशासन द्वारा गजेटेड छुट्टियों की सूची से हटा दिया गया था, जिससे स्थानीय जनता में असंतोष बढ़ा।
मेहबूबा मुल्तानी पर घर में हिरासत का आरोप
पीपीडी (जनवादी लोकतांत्रिक पार्टी) की प्रमुख मेहबूबा मुल्तानी को शहीद दिवस के पूर्व संध्या पर घर में हिरासत में रखा गया, जैसा कि उनकी बेटी इल्तिजा मुल्तानी ने 12 जुलाई 2026 को X (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट किया। इल्तिजा ने लिखा, "हमें शहीद दिवस की पूर्व संध्या पर घर में हिरासत में रखा गया है, यह कारण केवल जम्मू‑कश्मीर पुलिस को पता है।" यह बयान तुरंत व्यापक चर्चा का कारण बना।
स्थानीय प्रशासन की प्रतिक्रियाएँ
जिला प्रशासन ने अभी तक इस आरोप को स्पष्ट रूप से खारिज या पुष्टि नहीं की है। तथापि, कई राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम स्थानीय सरकार द्वारा विपक्षी आवाज़ों को दबाने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है, विशेषकर जब शहीद दिवस जैसे संवेदनशील अवसर पर सार्वजनिक प्रदर्शन की संभावना अधिक रहती है।
इतिहास और वर्तमान राजनीतिक माहौल
डोगरा सेना की 1931 की बर्बरता को याद करते हुए शहीद दिवस हमेशा से जम्मू‑कश्मीर में राष्ट्रीय भावना को उजागर करता रहा है। इस वर्ष के शहीद दिवस की पूर्व संध्या पर राजनीतिक उत्पीड़न की खबरें, पिछले वर्षों की तुलना में अधिक तीव्रता से सामने आई हैं, जहाँ अक्सर सुरक्षा बलों द्वारा विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए प्रतिबंध लगाए जाते रहे हैं।
भविष्य के संभावित प्रभाव
यदि मेहबूबा मुल्तानी की इस हिरासत को न्यायिक प्रक्रिया के बिना लागू किया गया, तो यह कश्मीर की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों पर सवाल उठाएगा। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने पहले भी जम्मू‑कश्मीर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चिंता व्यक्त की है, और यह घटना उन चिंताओं को फिर से उजागर कर सकती है।