भाजपा की ‘एक राष्ट्र’ सिद्धांत और डर‑आधारित राजनीति ने क्षेत्रीय दलों को तीव्र संकट में डाल दिया है। प्रहसन किशोर, तृणमूल कांग्रेस और अन्य स्थानीय ताकतें अब अपनी जड़ें खो रही हैं, जिससे भारतीय लोकतंत्र की बहुलता खतरे में है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • भाजपा का एकरूपता‑आधारित एजेंडा क्षेत्रीय पार्टियों को कमजोर कर रहा है।
  • आंतरिक संगठनात्मक क्षीणता और पेशेवर एजेंसियों पर निर्भरता ने स्थानीय दलों की आधारभूत शक्ति को घटाया है।
  • उपभोक्ता‑केन्द्रित राजनीति की कमी ने क्षेत्रीय पार्टियों की पुनरुत्थान को जटिल बना दिया है।

जैसे‑जैसे बीजेपी की सत्ता में दरारें दिखने लगीं, वहीँ राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर बदलाव की संभावनाएँ सामने आईं। फिर भी, प्रहसन किशोर (बिहार), ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (पश्चिम बंगाल) और अकिलेश यादव की समाजवादी पार्टी (उत्तर प्रदेश) जैसी पार्टियों ने नई राजनीतिक जगह को कब्जा करने में विफलता दिखाई। इन विफलताओं के पीछे केवल भाजपा की आक्रामक रणनीति ही नहीं, बल्कि स्वयं क्षेत्रीय दलों की आंतरिक कमियां भी हैं।

भाजपा का ‘एक राष्ट्र’ सिद्धांत और उसका असर

भाजपा ने ‘एक राष्ट्र’ के नारे के तहत सांस्कृतिक समानता, डर और पक्षपात का उपयोग करके वैध प्रतिस्पर्धा को विकृत किया है। यह रणनीति न केवल केंद्र में बल्कि राज्य स्तर पर भी स्थानीय पार्टियों की आवाज़ को दबा देती है, जिससे वे अपने मूल मतदाताओं से जुड़ने में असमर्थ हो जाते हैं।

आंतरिक संगठनात्मक क्षीणता का कारण

राजनीति शास्त्री के के.के. कैलाश के अनुसार, ‘मास पार्टी मॉडल’—जो स्थानीय स्तर पर जमीनी संगठनों को प्राथमिकता देता था—अब पुराना हो चुका है। अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियां अब ‘पार्टी इन पब्लिक ऑफ़िस’ पर निर्भर हैं, जिससे जमीनी स्तर की सहभागिता घट गई है। तृणमूल कांग्रेस ने अपने निर्णय‑निर्धारण को IPAC जैसे राजनीतिक परामर्श फर्म को सौंप दिया, जिससे पार्टी के पुराने विचारकों का त्याग हुआ।

भू‑राजनीतिक इतिहास की पृष्ठभूमि

1990 के दशक में केंद्र की कमजोरी और आर्थिक उदारीकरण ने राज्य‑स्तर की पार्टियों को राष्ट्रीय मंच पर उभारा। यह वह समय था जब कांग्रेस की गिरावट और भाजपा की उभरती ताकत ने फेडरलिज़्म को नई दिशा दी। लेकिन अब वही प्रक्रिया ‘केन्द्रिकरण’ की ओर उलट रही है, जिससे क्षेत्रीय दलों की प्रभावशीलता घट रही है।

भविष्य के लिए चुनौतियां और संभावनाएं

समाजवादी पार्टी को अपने ‘धर्म‑यादव’ की छवि से बाहर निकलकर एक समावेशी, विकास‑उन्मुख एजेंडा पेश करना होगा। अन्य क्षेत्रीय पार्टियों को भी अपने संगठनात्मक ढांचे को पुनःसुदृढ़ करना, पेशेवर चुनावी रणनीतियों के साथ साथ जमीनी स्तर की सहभागिता को बढ़ावा देना आवश्यक है। बिना ऐसी बहु‑आयामी रणनीति के, भारतीय लोकतंत्र की बहुलता और संघीय ढांचा खतरे में रहेंगे।