दिल्ली के मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने पीएम‑उदय योजना को तेज़ करने हेतु केंद्र सरकार से 100 करोड़ रुपये की सहायता मांगी है। यह राशि तकनीकी सर्वे, जिला‑स्तरीय यूडै‑सेल्स और जागरूकता अभियान में खर्च होगी।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- दिल्ली सरकार ने अनधिकृत कॉलोनियों के नियमितीकरण के लिए केंद्र से 100 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता की माँग की।
- फंड का उपयोग तकनीकी सर्वेक्षण (DRISHTI), जिला‑स्तरीय पीएम‑उदय सेल्स और सार्वजनिक जागरूकता कार्यक्रमों के लिए होगा।
- नियमों में बदलाव से 1,511 कॉलोनियों को ‘जैसे हैं, वैसे ही’ मान्यता मिलेगी, बिना लेआउट योजना के।
नई दिल्ली – दिल्ली के मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने केंद्र सरकार के आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री मनोहर लाल को एक औपचारिक पत्र में 100 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता का अनुरोध किया है, ताकि पीएम‑उदय (PM‑Uday) योजना के तहत अनधिकृत कॉलोनियों के नियमितीकरण को तेज़ किया जा सके। यह पहल राजधानी में लगभग 45 लाख निवासियों को संपत्ति अधिकार प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी, लेकिन आवेदन संख्या कम होने के कारण प्रक्रिया धीमी चल रही थी।
पृष्ठभूमि और नीति परिवर्तन
अप्रैल 2026 में केंद्र सरकार ने एक सरलीकृत प्रक्रिया घोषित की, जिसमें 1,511 अनधिकृत कॉलोनियों को “जैसे हैं, वैसे ही” (as‑is, where‑is) आधार पर नियमित किया जाएगा, और लेआउट योजना की आवश्यकता नहीं रहेगी। इस बदलाव से सभी प्लॉट और इमारतों के उपयोग को आवासीय माना जाएगा, जिससे भूमि‑संबंधी विवादों में कमी आने की उम्मीद है।
फंड का विभाजन
मुख्य मंत्री के कार्यालय के बयान के अनुसार, मांगी गई 100 करोड़ रुपये को तीन प्रमुख घटकों में बाँटा गया है:
- DRISHTI तकनीकी सर्वेक्षण प्रणाली – 65 करोड़ रुपये, जिससे डिजिटल मानचित्रण और भूमि‑सर्वेक्षण को तेज़ किया जाएगा।
- जिला‑स्तरीय पीएम‑उदय सेल्स – 25 करोड़ रुपये, प्रत्येक 13 जिलों में अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट की देखरेख में स्थापित किए जाएंगे, जिससे 45 दिनों के भीतर संपत्ति दस्तावेज़ जारी किए जा सकेंगे।
- जागरूकता अभियान – 10 करोड़ रुपये, जिसमें रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) के साथ कार्यशालाएँ, हेल्प डेस्क और जनजागृति शिविर शामिल होंगे।
पहले के प्रयास और चुनौतियाँ
2020 में बीजेपी‑नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने 1,731 अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने के लिए पीएम‑उदय योजना शुरू की थी, लेकिन दिल्ली सरकार के साथ समन्वय की कमी और DDA की एजेंसी भूमिका ने प्रक्रिया को जटिल बना दिया। मार्च 2026 तक केवल 40,000 कंवेयन्स डीड और ऑथराइजेशन स्लिप जारी हुए थे, और कई निवासियों को लेआउट योजना न होने के कारण निर्माण अनुमतियों में बाधा का सामना करना पड़ा।
विशेषज्ञों की राय
शहरी नीति विशेषज्ञों ने कहा है कि जबकि “जैसे हैं, वैसे ही” नियम तेज़ी से अधिकार प्रदान कर सकते हैं, लेकिन इससे बुनियादी ढाँचे—जैसे जल आपूर्ति, सीवेज, कचरा प्रबंधन और ओवरहेड केबल्स—के सुधार को अनदेखा किया जा सकता है। इसलिए, फंड के हिस्से को इन सेवाओं के इंटेग्रेशन में भी निवेश करना आवश्यक है, ताकि नियमितीकरण के बाद भी रहने की गुणवत्ता बनी रहे।
यदि केंद्र सरकार समय पर इस 100 करोड़ रुपये के पैकेज को मंजूरी देता है, तो दिल्ली के लाखों निवासियों को जल्द ही कानूनी संपत्ति अधिकार मिल सकते हैं, जिससे न केवल बिन‑कानूनी निर्माण को कम किया जाएगा, बल्कि शहर की राजस्व आधार भी मजबूत होगी।