केन्द्रीय सामाजिक विज्ञान संस्थान (CSDS) पर केंद्र सरकार ने 90% अनुदान समाप्त कर दिया, जिससे संस्थान की वित्तीय स्थिति नाज़ुक हो गई। योगेंद्र यादव इस कदम को ‘बुलडोजर जस्टिस’ के रूप में करुणा के साथ उजागर करते हुए, लोकतंत्र में वैध प्रक्रिया की अनदेखी पर सवाल उठाते हैं।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • CSDS को 90% फंडिंग कटौती का सामना
  • ‘बुलडोजर जस्टिस’ की अवधारणा से न्याय प्रक्रिया का उलटफेर
  • लोकनिति सर्वेक्षण को संभावित दमन का लक्ष्य

केन्द्रीय सामाजिक विज्ञान संस्थान (CSDS) भारत के सामाजिक विज्ञान में एक प्रमुख संस्था रही है, जो 1963 में राजनी कोठारी द्वारा स्थापित की गई थी। इस संस्थान ने कई दशकों तक सामाजिक विज्ञान के विकास में भाषा, डीकॉलोनाइजेशन और चुनावी सर्वेक्षण जैसे क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभाई। लेकिन जुलाई 2026 में, केंद्र सरकार ने CSCS को उसके कुल वेतन बिल के 90% तक की अनुदान राशि काट दी, जिससे संस्थान के अस्तित्व को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया।

‘बुलडोजर जस्टिस’ की परिभाषा और उसका प्रभाव

योगेंद्र यादव ने इस कदम को ‘बुलडोजर जस्टिस’ कहा, जहाँ पहले से तय लक्ष्य, सजा और बहाना तैयार किया जाता है, फिर प्रक्रिया को वैध बनाने के लिए पीछे से एक समिति गठित की जाती है। यह विधि न्याय के मूल सिद्धांतों – आरोप‑साक्ष्य‑जांच‑सजायुक्त – को उलट देती है, क्योंकि पहले से ही सार्वजनिक रूप से अपराधी घोषित कर दिया जाता है, फिर बाद में औपचारिक कारण बनाते हैं।

CSDS का ऐतिहासिक महत्व और वर्तमान स्थिति

CSDS ने भारतीय सामाजिक विज्ञान में कई प्रमुख विद्वानों को जन्म दिया – आशिष नांडी, डी. एल. शेत, रामश्री रॉय, सुजीत पॉलशिकर आदि। संस्थान ने न केवल अंग्रेजी में बल्कि भारतीय भाषाओं में भी सामाजिक विज्ञान को विस्तारित किया, जो उस समय के पश्चिमी‑उन्मुख शैक्षणिक परिदृश्य में दुर्लभ था। 2014 के बाद, CSDS ने राजनीतिक रूप से निरपेक्ष रुख अपनाया, विशेषकर उसका लोकनिति सर्वेक्षण, जिसने बिना पक्षपात के चुनावी रुझानों को दर्शाया, अक्सर भाजपा की जीत को अधिक अनुमानित किया।

ट्रिगर की खोज: मामूली त्रुटि से बड़ा खिंचाव

अगस्त 2025 में, प्रोफ़ेसर संजय कुमार ने महाराष्ट्र के चार विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता संख्या में असामान्य परिवर्तन को एक ट्वीट में प्रकाशित किया, जिसमें गणना त्रुटि थी। त्रुटि को 48 घंटे में हटाकर माफ़ी भी मांग ली गई। फिर कुछ दिनों पहले, CSDS ने चुनाव आयोग की लोकप्रियता में गिरावट दर्शाते हुए एक सर्वेक्षण प्रकाशित किया। इन दो मामूली घटनाओं को मिलाकर सरकार और उसके समर्थकों ने CSDS को ‘उदाहरणात्मक सजा’ का लक्ष्य बना दिया।

भविष्य के निहितार्थ

यदि CSDS जैसी संस्थाओं को आर्थिक दबाव के माध्यम से मौन किया जाता है, तो भारतीय शैक्षणिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक निगरानी दोनों को गंभीर नुकसान होगा। ‘लोकनिति’ जैसी विश्वसनीय सर्वेक्षण प्रणाली को दमन करने से चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता घटेगी, और यह एक चेतावनी बन सकती है कि कोई भी स्वतंत्र अनुसंधान संस्थान सरकार की आलोचना नहीं कर सकता।

इस प्रकार, ‘बुलडोजर जस्टिस’ का यह रूप केवल एक संस्था को ही नहीं, बल्कि पूरे शैक्षणिक परिदृश्य को खतरे में डाल रहा है, जहाँ वैध प्रक्रिया को फिर से लिखने का प्रयास हो रहा है।