कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के राज्य सचिव एम. वीरेपनियन ने होसूर में मेकेडाटु बांध के विरोध में रैली का नेतृत्व किया, कोर्ट के जल‑साझा आदेशों का पालन करने की मांग की। उन्होंने कहा कि यह परियोजना दो राज्यों के बीच की सौहार्दपूर्ण रिश्ते को खतरे में डाल रही है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- मेकेडाटु परियोजना पर कर्नाटक सरकार का विरोध बढ़ा
- सीपीआई ने तमिलनाडु‑कर्नाटक जल‑साझा आदेशों की रक्षा का आह्वान किया
- होसूर में रैली के दौरान भारी पुलिस तैनाती हुई
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) के राज्य सचिव एम. वीरेपनियन ने मंगलवार को होसूर में मेकेडाटु परियोजना के विरोध में एक बड़े रैली का नेतृत्व किया। तमिलनाडु के थैली विधानसभा सदस्य टी. रामाचरण के साथ उपस्थित होकर उन्होंने कर्नाटक सरकार से बांध निर्माण को तुरंत रोकने और दो राज्यों के बीच जल‑साझा के मौजूदा न्यायिक आदेशों का सम्मान करने का आग्रह किया।
पृष्ठभूमि और जल‑विवाद
मेकेडाटु परियोजना, कर्नाटक के कावेरी नदी पर प्रस्तावित एक जल‑भंडारण तथा जल‑विद्युत परियोजना है, जो जल‑संकट को कम करने के उद्देश्य से तैयार की गई थी। हालाँकि, तमिलनाडु के साथ जारी कावेरी जल‑विवाद के कारण इस परियोजना को कई वर्षों से न्यायालय के आदेशों का सामना करना पड़ रहा है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने दो राज्यों के बीच जल‑साझा के स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए थे, जिनमें कर्नाटक को जल‑भंडारण पर प्रतिबंध की शर्तें थीं।
सीपीआई का रैली में बयान
रैली में बोलते हुए वीरेपनियन ने कहा, "मेकेडाटु परियोजना तमिलनाडु‑कर्नाटक के लोगों के बीच लंबे समय से स्थापित मित्रता को खतरे में डाल रही है। हमें कोर्ट के आदेशों का सम्मान करना चाहिए और डेल्टा क्षेत्र में सूखे को कम करने के लिए सहयोगी उपाय अपनाने चाहिए।" उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि तमिलनाडु ने कर्नाटक के लोगों के अधिकारों को मान्यता दी है, और अब कर्नाटक को भी तमिलनाडु के लोगों के अधिकारों को स्वीकार करना चाहिए।
रैली की स्थिति और पुलिस की प्रतिक्रिया
रैली को थैली रोड पर पुलिस ने अस्थायी रूप से रोका, लेकिन सैकड़ों समर्थकों ने भारी पुलिस तैनाती के बावजूद मार्च जारी रखा। इस घटना ने दो राज्यों के बीच जल‑साझा मुद्दे को फिर से राष्ट्रीय मंच पर लाया है, जहाँ राजनीतिक दल और किसान संघ दोनों ही समाधान की मांग कर रहे हैं।
आगे की संभावनाएँ
यदि कर्नाटक सरकार मेकेडाटु परियोजना को आगे बढ़ाती है, तो यह न्यायालय के आदेशों के उल्लंघन के रूप में देखा जा सकता है, जिससे भविष्य में कानूनी जाँच‑पड़ताल और संभावित दंड का सामना करना पड़ सकता है। दूसरी ओर, जल‑संकट को सुलझाने के लिए दोनों राज्यों को मिलकर जल‑प्रबंधन, जल‑संरक्षण और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान देना आवश्यक है।