भारत में हर तीन मिनट में एक preventable सड़क दुर्घटना मृत्यु होती है। इस लेख में संविधानिक विभाजन, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और एकीकृत रोड सुरक्षा परिषद के निर्माण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- भारत में हर 3 मिनट में एक preventable सड़क दुर्घटना मृत्यु होती है।
- संसदीय स्तर पर एकीकृत रोड सुरक्षा परिषद बनाना आवश्यक है।
- संविधानिक संशोधन और राज्य‑केंद्र सहयोग से ही प्रणालीगत सुधार संभव है।
भारत में सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतें केवल आँकड़े नहीं, बल्कि एक संवैधानिक विफलता का प्रतीक हैं। राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित आंकड़े दिखाते हैं कि 2024 में मात्र दो प्रमुख एजेंसियों ने 1.75 लाख से 1.81 लाख तक की मृत्यु का अनुमान लगाया, जबकि मंत्रालय ने 1.77 लाख बताया। यह अंतर डेटा की कमी नहीं, बल्कि नीति‑निर्माण में मौलिक असंगतियों का संकेत है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक हस्तक्षेप
2014 में S. राजसीकर बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने “सड़क सुरक्षा के चार E” – Engineering, Enforcement, Education और Emergency Care – को उजागर किया। कोर्ट ने पाया कि हाईवे रख‑रखाव के लिए केवल 35‑40 % अनुमानित फंड उपलब्ध है, आपातकालीन सेवाओं की कमी है, और कानूनों का लागू होना केवल कागज़ पर ही सीमित है। यह स्पष्ट था कि दुर्घटनाएँ “रैंडम दुर्भाग्य” नहीं, बल्कि मानवीय विफलता का परिणाम हैं, और इस कारण वे पूरी तरह से रोकी जा सकती हैं।
संविधानिक जटिलता और उत्तरदायित्व का अभाव
भारत का संविधान सड़क, पुलिस, सार्वजनिक स्वास्थ्य और वाहन नियमन को विभिन्न सूचियों (Union, State, Concurrent) में बाँटता है। राष्ट्रीय राजमार्ग केंद्र के अधीन हैं, जबकि राज्य सड़कें और पुलिस राज्य के अधिकार में आती हैं; वाहन नियम संयुक्त सूची में हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य एक राज्य विषय है। इस विभाजन के कारण कोई एकल संस्था दुर्घटनाओं को रोकने की पूरी ज़िम्मेदारी नहीं ले पाती। परिणामस्वरूप, कई बार समिति, सलाहकार बोर्ड और प्रस्तावित आयोग बनते रहे, पर वास्तविक कार्यान्वयन नहीं हो पाया।
GST मॉडल से प्रेरित समाधान
जब कर प्रणाली में समान विभाजन ने कार्यहीनता पैदा की, तो संसद ने 101वें संविधान संशोधन द्वारा GST परिषद स्थापित की, जिससे केंद्र‑राज्य सहयोग सशक्त हुआ। उसी मॉडल को अपनाते हुए एक Road Safety Coordination Council बनाना चाहिए, जहाँ केंद्र और राज्य मिलकर सड़क डिजाइन, वाहन फिटनेस, आपातकालीन देखभाल और मृत्यु रिपोर्टिंग के मानक तय करेंगे। साथ ही, सातवें अनुसूची में संशोधन करके सड़कों और ट्रैफ़िक को सीधे संसद के विधायी दायरे में लाना आवश्यक है।
भविष्य की राह: विधायी आदेश और जिला स्तर पर कार्यान्वयन
संविधानिक संशोधन के साथ-साथ संसद को District Road Safety Committees को विधिक शक्ति प्रदान करनी चाहिए, ताकि राज्य‑स्तर पर लापरवाही के लिए स्पष्ट दंड हो। केवल न्यायालयों का बार‑बार हस्तक्षेप अस्थायी राहत दे सकता है, लेकिन स्थायी सुधार तभी संभव है जब संसद सख्त नियामक ढांचा स्थापित करे।