तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की करूर दौरे के बाद, कार्यकर्ता टी.आर. रमेश ने सरकार पर 25,000 करोड़ रुपये मूल्य वाले मंदिर भूमि को अतिक्रमणकारियों को सौंपने का आरोप लगाया। अदालत ने इस मुद्दे को सार्वजनिक हित याचिका के तहत सुनवाई का आदेश दिया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • 3,085 एकड़ मंदिर भूमि पर पंजीकरण प्रतिबंध हटाया गया
  • मुख्यमंत्री विजय और TVK सरकार को अतिक्रमणकारियों को जमीन सौंपने का आरोप
  • जमीन का मूल्यांकन लगभग ₹25,000 करोड़ बताया गया

करूर, तमिलनाडु के एक प्रमुख ज़िला में, पिछले दो दशकों से चल रहे 'मंदिर भूमि' विवाद ने फिर से सुर्ख़ियों में जगह बना ली है। 10 जुलाई को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के करूर आगमन के बाद, सामाजिक कार्यकर्ता टी.आर. रमेश ने अपने सोशल‑मीडिया पोस्ट में राज्य सरकार और हिंदू धार्मिक एवं चैरिटेबल एंडोमेंट्स (HR&CE) विभाग पर आरोप लगाया कि उन्होंने चार प्रमुख मंदिरों की भूमि को अतिक्रमणकारियों को सौंप दिया है। यह भूमि लगभग 3,085 एकड़ के क्षेत्र में फैली हुई है और इसका अनुमानित मूल्य लगभग ₹25,000 करोड़ है।

पृष्ठभूमि और कानूनी पथ

2000 के दशक की शुरुआती दशकों में, इन भूमि को चार मंदिरों – श्री बालासुब्रमणियार मंदिर (पुगालिमलाई), श्री कल्याणापसुपतीश्वर मंदिर (करूर), रवीश्वर मंदिर (कुप्पुचिपालयम) और विक्रुतीश्वर मंदिर (वेंजामंकुडालुर) – के नाम पर दर्ज किया गया था। 1964 में लाए गए 'मिनर इनाम' (छोटे इनाम) उन्मूलन द्वारा इन भूमि को रयोटवरी पत्ता प्रणाली में बदल दिया गया, जिससे व्यक्तिगत पट्टाधारकों को अधिकार मिला। परन्तु 2000 के दशक में HR&CE विभाग ने इन भूमि को फिर से मंदिर के स्वामित्व में घोषित कर पंजीकरण प्रतिबंध लगा दिया, जिससे लगभग 3,390 पट्टाधारियों को अपने अधिकारों से वंचित किया गया।

जिला कलेक्टर की सिफ़ारिश और उच्च न्यायालय की कार्रवाई

करूर जिला कलेक्टर सी. मुथुकुमारन ने 9 जुलाई को HR&CE कमिश्नर टी.जी. विनय को सलाह दी कि प्रतिबंध हटाया जाए। कलेक्टर के इस कदम से भूमि को पुनः विकास या पुनःसंकल्पन के अवसर मिलेंगे, जिससे लगभग 10,000 लोगों को आर्थिक लाभ हो सकता है। लेकिन इस निर्णय को सार्वजनिक हित याचिका (PIL) के तहत सेलेम निवासी ने चुनौती दी। मदरास उच्च न्यायालय के मदुरै बेंच ने 14 जुलाई को राज्य सरकार को प्रतिवादी के रूप में प्रतिवादी अफ़िडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया।

‘मिनर इनाम’ की अवधारणा और उसका उन्मूलन

‘इनाम’ शब्द का अर्थ छोटे टुकड़े की जमीन से था, जो ऐतिहासिक रूप से धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं को दिया जाता था। इन संस्थाओं को ‘मेलवारम्’ (कर संग्रह अधिकार) और ‘कुडिवारम्’ (भौतिक कब्ज़ा) दोनों अधिकार प्राप्त होते थे। स्वतंत्रता के बाद, ‘जमीन किसान को’ सिद्धांत के तहत इन इनामों को समाप्त कर रयोटवरी प्रणाली लागू की गई, जिससे सीधे किसान को भूमि अधिकार मिले और मध्यस्थों की भूमिका समाप्त हुई।

भविष्य के संभावित प्रभाव

यदि उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार पंजीकरण प्रतिबंध हटा दिया जाता है, तो यह न केवल आर्थिक विकास को प्रेरित करेगा, बल्कि सामाजिक न्याय की नई दिशा भी तय कर सकता है। लेकिन साथ ही, यह मंदिरों के स्वामित्व और सामाजिक सेवाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती भी पेश करता है, जिससे भविष्य में समान विवादों को रोकने हेतु स्पष्ट नीतियों की आवश्यकता होगी।