कर्नाटक की मुख्य सचिव शालिनी राजनीश ने कम बारिश के चलते सभी सरकारी कार्यालयों में ऊर्जा और जल की बचत के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए। निर्देशों में प्राकृतिक प्रकाश का अधिकतम उपयोग, एसी तापमान नियंत्रण और LED‑लाइटिंग शामिल है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • कम बरसात के कारण जल‑और‑बिजली संरक्षण के लिए नई नीतियां लागू
  • ऑफिस में प्राकृतिक प्रकाश, LED लाइट, मोशन सेंसर और एसी तापमान सीमा को अनिवार्य किया गया
  • सुरक्षा कर्मियों को 6 बजे के बाद उपकरण बंद रखने का निर्देश

कर्नाटक की मुख्य सचिव शालिनी राजनीश ने राज्य भर के सभी सरकारी कार्यालयों, जिसमें विधान सभा और विकास सभा प्रमुख भवन शामिल हैं, को बिजली और पानी की बर्बादी रोकने के लिए कठोर निर्देश जारी किए। यह कदम अत्यधिक कमी वाले बरसात के मौसम के प्रत्यक्ष परिणामस्वरूप उठाया गया है, जहाँ जल उपलब्धता और ऊर्जा मांग दोनों पर दबाव बढ़ गया है।

कम बरसात की पृष्ठभूमि

2026 की मौसमी रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक में इस वर्ष का मॉनसून औसत से 30 % कम रहा है, जिससे जलाशयों में गंभीर कमी आई है। कृषि, उद्योग और घरेलू उपयोग के लिए जल स्रोतों की कमी ने प्रशासन को ऊर्जा बचत के साथ जल संरक्षण के उपाय तेज़ करने के लिए प्रेरित किया। पिछले कुछ वर्षों में, राज्य ने कई जल‑संकट देखे हैं, जिससे इस बार की नीति को अधिक गंभीरता से लिया जा रहा है।

नियमों का विस्तृत विवरण

नियमों में मुख्य रूप से चार स्तंभ शामिल हैं: (1) प्राकृतिक प्रकाश का उपयोग – सभी कार्यालयों की खिड़कियों को खुला रखने और दिन के समय लाइटिंग को न्यूनतम करने की सलाह दी गई है। (2) विद्युत उपकरणों का प्रबंधन – सुरक्षा गार्ड को 6 PM के बाद सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बंद करने का निर्देश दिया गया, साथ ही व्यक्तिगत सचिवों को कमरे खाली होने पर स्विच ऑफ करने का आदेश है। (3) एसी तापमान नियंत्रण – एसी को 24‑26 °C के बीच रखने का आदेश दिया गया, जिससे अत्यधिक ठंडक की बजाय ऊर्जा बचत पर जोर दिया गया। (4) ऊर्जा‑सक्षम उपकरण – पुराने बल्बों को LED में बदलना, कॉरिडोर, शौचालय और हॉल में मोशन‑सेंसर लाइट लगाना और जल बचत के लिए एयरेटर स्थापित करना अनिवार्य किया गया।

ऐतिहासिक संदर्भ और तुलना

कर्नाटक ने 2019 में भी समान उपाय अपनाए थे, परंतु उस समय बरसात सामान्य स्तर पर थी, जिससे ये उपाय कम प्रभावी रहे। इस बार की नीति को विशेष रूप से जल‑संकट के साथ ऊर्जा‑संकट को दोहरा सामना करने के लिए तैयार किया गया है, और यह अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए एक मॉडल बन सकता है।

भविष्य की संभावनाएँ

इन निर्देशों के कार्यान्वयन से सरकारी खर्च में उल्लेखनीय कमी की उम्मीद है, साथ ही जल संरक्षण के माध्यम से ग्रामीण जल‑संकट को भी कम किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निजी क्षेत्र भी इन मानदंडों को अपनाएगा, तो कर्नाटक के ऊर्जा‑कार्बन फुटप्रिंट में काफी सुधार हो सकता है, जिससे राज्य का सतत विकास लक्ष्य तेज़ होगा।