सोनम वांगचुक की हड़ताल के 19वें दिन दिल्ली में विरोधी पार्टियों ने एकजुट होकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्राधान के पदत्याग की माँग की। अंबेडकर के बाद के इस आंदोलन में आप, कांग्रेस, सपा, राष्ट्रीय सम्मेलन और जम्मू‑कश्मीर के कई नेताओं ने समर्थन जताया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- विरोधी गठबंधन ने सोनम वांगचुक के साथ एकजुटता जताई
- शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्राधान के पदत्याग की मांग बढ़ी
- केंद्रीय परीक्षा में बार-बार पेपर लीक से सार्वजनिक भरोसा टूट रहा है
सोनम वांगचुक के 19वें दिन के उपवास के बाद, दिल्ली के जंतर मंच पर विरोधी दलों ने एकजुट स्वर में सरकार को जवाबदेह ठहराया। राष्ट्रीय स्तर पर आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने वांगचुक के साथ खड़े होकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्राधान को हटाने का आग्रह किया। केजरीवाल ने वांगचुक को “महान शैक्षिक कार्यकर्ता” कहकर सराहा और लद्दाख में उनके कई कार्यों को उजागर किया।
पार्टी‑पार्टी का समर्थन
कांग्रेस ने भी इस आंदोलन में भाग लिया, जबकि पहले वह इस हड़ताल पर मौन रहा था। पार्टी के महासचिव के.सी. वेनुगोपल ने कहा कि वे वांगचुक की “चिंता और क्रोध” को साझा करते हैं और प्राधान के पदत्याग की माँग को दोहराया। जम्मू‑कश्मीर के मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला, समाजवादी पार्टी की सांसद डिम्पल यादव और केरल के विपक्षी नेता पिनरायि विजयन ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए केंद्र सरकार को जवाबदेह ठहराया।
पेपर लीक का राष्ट्रीय प्रभाव
केजरीवाल ने बार‑बार होने वाले परीक्षा पेपर लीक को “मेरिटोक्रेसी में सार्वजनिक विश्वास का संकट” बताया। उन्होंने अपने स्वयं के आईआईटी प्रवेश अनुभव को उदाहरण देते हुए कहा कि यदि उस समय लीक होते तो उनका आत्मविश्वास टूट जाता। उन्होंने यह भी उजागर किया कि पिछले कुछ वर्षों में NEET और CBSE परीक्षा में लीक से 20 से अधिक छात्रों की आत्महत्या हुई, पर सरकार की प्रतिक्रिया अपर्याप्त रही।
ऐतिहासिक समानताएँ और भविष्य की दिशा
केजरीवाल ने 2011 में अन्ना हज़ारे के विरोध के साथ इस स्थल की तुलना की, जहाँ भी सरकार की अहेडता को लेकर व्यापक विरोध हुआ था। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि युवा वर्ग की धैर्य समाप्त हो गई तो राजनीतिक अस्थिरता का जोखिम बढ़ेगा। केजरीवाल ने अपने ट्विटर (X) पोस्ट में पुनः कहा, “सोनम वांगचुक को शिक्षा मंत्री नियुक्त किया जाए, धर्मेंद्र प्राधान को हटाया जाए।”
वांगचुक के समर्थन में यह व्यापक गठबंधन भारतीय राजनीति में एक नई लहर का संकेत देता है, जहाँ शैक्षिक सुधार और परीक्षा पारदर्शिता को राष्ट्रीय मुद्दा माना जा रहा है। यह आंदोलन न केवल नीति‑निर्माताओं को बल्कि आम जनता को भी परीक्षा प्रणाली की अखंडता के लिए जागरूक कर रहा है।