दिल्ली उच्च न्यायालय जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की 'दखलअंदाजी वाली निगरानी' के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करेगा। पूर्व जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष आइशी घोष द्वारा दायर इस याचिका में पुलिस द्वारा की जा रही फोटोग्राफी और निगरानी टावर को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- दिल्ली हाईकोर्ट 20 जुलाई, 2026 को आइशी घोष द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करेगा।
- याचिका में जंतर-मंतर पर दिल्ली पुलिस द्वारा लगाए गए स्थायी निगरानी टावर और प्रदर्शनकारियों की वीडियोग्राफी को चुनौती दी गई है।
- आरोप है कि पुलिस ने छात्रों को डराने के लिए उनकी तस्वीरें उनके माता-पिता और संस्थानों को भेजने की धमकी दी।
दिल्ली उच्च न्यायालय जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस द्वारा की जा रही "दखलअंदाजी वाली निगरानी" के खिलाफ दायर एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) पर 20 जुलाई, 2026 को सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (JNUSU) की पूर्व अध्यक्ष आइशी घोष द्वारा दायर इस याचिका में मांग की गई है कि विरोध स्थल पर स्थायी निगरानी टावर के संचालन, अंधाधुंध फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी को असंवैधानिक घोषित किया जाए, क्योंकि यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है।
डराने-धमकाने और निजता के हनन का आरोप
याचिका के अनुसार, 6 जून, 2026 को प्रदर्शन शुरू होने के बाद से ही प्रदर्शनकारियों पर चौबीसों घंटे निगरानी रखी जा रही है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह निगरानी बिना किसी वैधानिक अधिकार, प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों या संवैधानिक औचित्य के की जा रही है। सबसे गंभीर आरोप यह है कि पुलिस कर्मियों ने छात्र प्रदर्शनकारियों को धमकी दी कि उनकी तस्वीरें और वीडियो उनके माता-पिता, अभिभावकों और शैक्षणिक संस्थानों को भेजे जाएंगे। याचिका में कहा गया है कि इस तरह की धमकियों का उद्देश्य छात्रों को प्रदर्शन में भाग लेने से रोकना है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के संवैधानिक अधिकार पर आघात है।
NEET-UG विवाद और आंदोलन की पृष्ठभूमि
जंतर-मंतर पर चल रहा यह विरोध प्रदर्शन NEET-UG परीक्षा और अन्य सरकारी भर्ती परीक्षाओं में हुई धांधली और पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुआ था। सीजेपी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके के नेतृत्व में प्रदर्शनकारी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। यह आंदोलन देश में युवा और छात्र-नेतृत्व वाले नए राजनीतिक उभार को रेखांकित करता है, जो राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है।
संवैधानिक मर्यादा और मौलिक अधिकार
यह कानूनी विवाद एक बार फिर सार्वजनिक व्यवस्था और व्यक्तिगत निजता के बीच संतुलन के सवाल को न्यायपालिका के सामने लाता है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में निजता के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना गया था। दिल्ली पुलिस की इस कार्रवाई को चुनौती देकर, यह याचिका सवाल उठाती है कि क्या राज्य बिना किसी स्पष्ट कानून या आनुपातिक आवश्यकता के शांतिपूर्ण नागरिकों के खिलाफ उच्च-तकनीकी निगरानी उपकरणों का उपयोग कर सकता है।
भविष्य के लोकतांत्रिक विरोधों पर प्रभाव
जंतर-मंतर ऐतिहासिक रूप से भारत में लोकतांत्रिक असंतोष व्यक्त करने का मुख्य केंद्र रहा है। ऐसे में उच्च न्यायालय का यह फैसला देश में नागरिक स्वतंत्रताओं के भविष्य के लिए एक मिसाल कायम करेगा। यदि अदालत याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाती है, तो यह शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान राज्य की निगरानी शक्तियों पर लगाम लगाएगी। इसके विपरीत, राज्य के पक्ष में फैसला आने से सार्वजनिक स्थलों पर व्यापक निगरानी को सामान्य मान लिया जाएगा, जिससे लोकतांत्रिक विरोध की भावना हमेशा के लिए प्रभावित हो सकती है।