पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने चुनाव आयोग की विशेष पुनरावृत्ति (SIR) को लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक माना है। उन्होंने कहा कि करोड़ों मतदाता हटाना ‘जनसंख्या‑संशोधन’ नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- एसवाई कुरैशी ने SIR को ‘जनसंख्या‑संशोधन’ नहीं, लोकतंत्र का छेड़छाड़ बताया।
- बंगाल में 27 लाख मतदाता मतदान से वंचित हुए, जिससे परिणाम प्रभावित हुआ।
- न्यायालय की चुप्पी और चुनाव आयोग के कदमों पर व्यापक आलोचना बढ़ी।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने 13 जुलाई को विशेष इंटेंसिव रीविजन (SIR) प्रक्रिया को तीखा विरोध किया, जिसे उन्होंने “जनसंख्या‑संशोधन नहीं, लोकतंत्र का छेड़छाड़” कहा। ANI के साथ साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि मतदान एक संवैधानिक अधिकार है, जिसे चुनाव आयोग द्वारा दान नहीं किया जाता।
विशेष पुनरावृत्ति (SIR) क्या है?
SIR का उद्देश्य चुनावी रोल को अद्यतन करना और दोहरी प्रविष्टियों, मृत व्यक्तियों या प्रवासियों को हटाना है। हालांकि, कई राज्यों में इस प्रक्रिया को तेज़ी और बिना पर्याप्त पारदर्शिता के लागू किया गया, जिससे करोड़ों वैध मतदाता अपनी नामसूची से हट गए।
कुरैशी का मुख्य आरोप
कुरैशी ने कहा, “पूरी SIR प्रक्रिया ‘नहीं‑उद्देश्यपूर्ण’ है। करोड़ों मतदाता हटाना लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को कमजोर करता है।” उन्होंने विशेष रूप से बंगाल में 27 लाख मतदरों की बात की, जो मतदान से वंचित रहे और संभावित रूप से चुनाव परिणाम को बदल सकता है।
न्यायिक प्रतिक्रिया और राजनीतिक प्रतिक्रिया
उन्हें यह भी आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों की रक्षा में असफल रहा। विपक्षी दलों ने भी इस प्रक्रिया को ‘वोटर हेरफेर’ का आरोप लगाते हुए कई राज्यों—बिहार, बंगाल—में विरोध किया है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने कहा कि SIR का उद्देश्य ‘सटीक और अद्यतन इलेक्ट्रिकल रोल सुनिश्चित करना’ है।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि SIR प्रक्रिया को सुधारने के लिए पर्याप्त उपाय नहीं किए गए, तो आगामी चुनावों में मतदाता सहभागिता घट सकती है, जिससे लोकतांत्रिक वैधता पर प्रश्न उठेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि पारदर्शी डेटा‑प्रबंधन, स्वतंत्र निगरानी और न्यायालयीय हस्तक्षेप आवश्यक है, ताकि मतदाता अधिकार सुरक्षित रहें।
यह संघर्ष भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण मोड़ बन सकता है, जहाँ चुनाव आयोग, न्यायपालिका और राजनीतिक शक्ति के बीच संतुलन स्थापित करना अनिवार्य होगा।