कापिल सिबल ने कहा कि एंटी‑डिफेक्शन कानून की वर्तमान व्याख्या से अल्पसंख्यक पार्टी बहुसंख्यक बन सकती है, जबकि बहुसंख्यक पार्टी अल्पसंख्यक हो सकती है। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को जवाब देने का नोटिस जारी किया।
मुख्य बिंदु
- सुप्रीम कोर्ट ने कापिल सिबल की याचिका पर सुनवाई की अनुमति दी।
- एंटी‑डिफेक्शन कानून की व्याख्या से संसद में शक्ति संतुलन बदल सकता है।
- केन्द्र को तुरंत जवाब देना अनिवार्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने 27 जुलाई 2026 को स्वतंत्र राज्यसभा सांसद एवं वरिष्ठ अधिवक्ता कापिल सिबल द्वारा दायर याचिका को सुनने की स्वीकृति दी। यह याचिका संविधान के दसेवें अनुसूची (एंटी‑डिफेक्शन कानून) की व्याख्या को पुनः विचारने की मांग करती है, जिससे सांसद या विधायकों को किसी अन्य पार्टी के साथ विलय का दावा करके अयोग्य घोषित होने से बचा जा सके।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
दसेवीं अनुसूची 1985 में दलों के बीच अति-प्रभावी बदलाव को रोकने के लिए पारित हुई थी। हालांकि, “विलय” प्रावधान का दुरुपयोग कई बार देखा गया है, जिससे सरकार या विपक्ष की शक्ति संरचना में अचानक बदलाव आया है।
वर्गीकरण तालिका
| परिदृश्य | अल्पसंख्यक → बहुसंख्यक | बहुसंख्यक → अल्पसंख्यक |
|---|---|---|
| विलय प्रावधान का प्रयोग | छोटे दल बड़े दल में विलय करके बहुमत बनते हैं | बड़े दल छोटे दल में विलय कर बहुमत खो देते हैं |
| राजनीतिक प्रभाव | सरकार की स्थिरता बढ़ती है | सरकार की अस्थिरता बढ़ती है |
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia analysis shows that any reinterpretation of the Tenth Schedule could reshape the balance of power in both houses of Parliament, influencing future coalition dynamics and legislative stability.
"दसेवीं अनुसूची का विलय क्लॉज़ कभी भी संसद की संरचना बदलने के इरादे से नहीं बनाया गया था।" – संविधान विशेषज्ञ डॉ. रवीन्द्र शर्मा
Frequently Asked Questions
एंटी‑डिफेक्शन कानून क्या है? यह कानून सांसदों को अपनी पार्टी बदलने पर अयोग्य घोषित कर देता है, सिवाय स्वीकृत विलय के।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय क्या परिणाम देगा? यदि कोर्ट दसेवीं अनुसूची की व्याख्या बदलती है, तो भविष्य में कई मौजूदा और संभावित गठबंधन अस्थिर हो सकते हैं।