राज्यसभा के मॉनसून सत्र में मनुस्मृति के संदर्भ में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और भाजपा सांसद जेपी नड्डा के बीच तीखी वार्ता छिड़ी। खड़गे ने RSS‑प्रेरित सिलेबस को चुनौती दी, जबकि नड्डा ने उनके बयान को अस्वीकार किया, जिससे सदन में हंगामा हुआ।
मुख्य बिंदु
- खड़गे ने RSS‑संबंधित सिलेबस को अस्वीकार किया
- नड्डा ने खड़गे के बयान को तथ्य‑रहित कहा
- संसदीय सुरक्षा और शांति पर प्रश्न उठे
30 जुलाई 2026 को दिल्ली में आयोजित राज्यसभा के मॉनसून सत्र के दौरान, मनुस्मृति के अनुक्रमण को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने राजदूतों द्वारा तैयार किए गए सिलेबस पर गंभीर प्रश्न उठाए। उन्होंने कहा कि वर्तमान सिलेबस में शूद्रों के लिए अपमानजनक प्रावधान मौजूद हैं और इसे तुरंत हटाया जाना चाहिए।
इन आरोपों पर भाजपा सांसद जेपी नड्डा ने कड़ा विरोध किया, यह कहते हुए कि खड़गे के बयान तथ्य‑रहित हैं और मूल मनुस्मृति के प्रमाणित पाठ की मांग की। नड्डा ने कहा कि “ब्रिटिश काल से पहले का मूल पाठ लाया जाए” और ऐसे बयान सामाजिक शांति को खतरे में डालते हैं।
खड़गे की टिप्पणी के बाद सदन में तेज़ी से हंगामा बढ़ा, जहाँ कई सदस्य ने माफी माँगने की मांग की और “गुंडागर्दी नहीं चलेगी” के नारे लगाए। सभापति ने खड़गे के बयान को “एक्सपंज” (expunge) करने का आदेश दिया, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that the debate reflects deeper ideological divides over educational curricula and the reinterpretation of ancient texts, which could influence future policy and communal harmony in India.
Constitutional scholar Dr. Raghav Sharma says, "Any attempt to rewrite historical texts for political ends threatens the secular ethos of the nation."
Frequently Asked Questions
मनुस्मृति के मूल पाठ क्या हैं? मूल मनुस्मृति 2वीं शताब्दी ईसा पूर्व में लिखी गई एक वैदिक ग्रंथ है, जिसके कई अनुवाद और संस्करण आज तक उपलब्ध हैं।
राज्यसभा में इस विवाद के बाद क्या कार्रवाई की गई? सभापति ने खड़गे के बयान को हटाने का आदेश दिया और सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए अतिरिक्त उपाय किए गए।