कर्नाटक में चुनाव आयोग के विशेष गहन संशोधन (SIR) के दौरान लगभग 20% मतदाताओं को 'ASDDO' श्रेणी में डाल दिया गया है। नागरिक समूहों ने पारदर्शिता की मांग करते हुए विस्तृत सूची और सुधार के लिए समय बढ़ाने की याचिका दायर की है।
मुख्य बातें
- कर्नाटक के कुल 5.54 करोड़ मतदाताओं में से 1.11 करोड़ को ASDDO (अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, डुप्लिकेट और अन्य) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- 'माय वोट, माय राइट' गठबंधन ने मतदाता सूची को सार्वजनिक करने और समय सीमा बढ़ाने की मांग की है।
- बेंगलुरु शहरी जिले में सबसे अधिक प्रभावित मतदाता हैं।
- यह प्रतिशत उत्तर प्रदेश और गुजरात की तुलना में काफी अधिक है।
कर्नाटक में निर्वाचन आयोग के विशेष गहन संशोधन (SIR) के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण का चरण पूरा होने के करीब है, लेकिन इस प्रक्रिया ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। राज्य के लगभग पांचवें हिस्से यानी 20.04 प्रतिशत मतदाताओं को 'ASDDO' श्रेणी में रखा गया है। इस श्रेणी में वे लोग आते हैं जिन्हें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, डुप्लिकेट या अन्य माना गया है।
नागरिक समाज के 40 संगठनों के गठबंधन, "माय वोट, माय राइट" ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) वी. अंबुकुमार को एक याचिका भेजी है। गठबंधन का आरोप है कि मतदाताओं को उनके नाम हटाने या श्रेणी बदलने के बारे में कोई SMS या लिखित सूचना नहीं दी गई है। इससे आम नागरिक इस बात से अनभिज्ञ हैं कि उनका नाम आगामी मतदाता सूची में रहेगा या नहीं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र की आधारशिला है। यदि इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं को बिना सूचना के बाहर कर दिया जाता है, तो यह चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है। बेंगलुरु शहरी जिले में अकेले लगभग 50 लाख मतदाता इस वर्गीकरण से प्रभावित हुए हैं, जो एक गंभीर चिंता का विषय है।
मतदाता सूची का शुद्धिकरण अनिवार्य है, लेकिन यह प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए ताकि किसी भी पात्र नागरिक का मताधिकार न छिने।
तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो कर्नाटक में ASDDO का यह आंकड़ा देश में सबसे अधिक है। इससे पहले उत्तर प्रदेश में यह 19.09% और गुजरात में 14.45% दर्ज किया गया था। गठबंधन ने मांग की है कि बूथ-वार विवरण और वर्गीकरण के कारणों को आधिकारिक वेबसाइट पर तुरंत प्रकाशित किया जाए और त्रुटियों को सुधारने के लिए प्रक्रिया को 30 सितंबर तक बढ़ाया जाए।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में मतदाता सूची का संशोधन एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि केवल पात्र नागरिक ही मतदान कर सकें। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल डेटा और पुराने रिकॉर्ड के मिलान के दौरान बड़े पैमाने पर नाम हटाने के मामले सामने आए हैं, जिससे अक्सर राजनीतिक और सामाजिक विवाद उत्पन्न होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: ASDDO श्रेणी का क्या अर्थ है?
उत्तर: यह उन मतदाताओं के लिए है जिन्हें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, डुप्लिकेट या अन्य कारणों से सूची से बाहर करने की प्रक्रिया में रखा गया है।
प्रश्न 2: नागरिक समूह क्या मांग कर रहे हैं?
उत्तर: वे मांग कर रहे हैं कि ASDDO सूची को सार्वजनिक किया जाए और सुधार के लिए समय सीमा 30 सितंबर तक बढ़ाई जाए।