पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विपक्ष के विश्वास के बीच के गहरे संबंध पर प्रकाश डाला है। उन्होंने तर्क दिया कि आयोग की सफलता केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि हारने वाले पक्ष का भरोसा जीतने में निहित है।
मुख्य बातें
- चुनाव आयोग को सत्ता पक्ष के लिए नियामक और विपक्ष के लिए आश्वासन का काम करना चाहिए।
- संविधान ने आयोग को कार्यपालिका से स्वतंत्र रखने के लिए बनाया है।
- निष्पक्षता का अर्थ केवल कानून का पालन नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवहार भी है।
- विपक्ष का विश्वास जीतना ही लोकतंत्र की असली मजबूती है।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने हाल ही में अपने विचारों को साझा करते हुए स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग (EC) के लिए दोहरी चुनौती होती है। पहली चुनौती चुनावों को कुशलतापूर्वक संपन्न कराना है, जो एक सांख्यिकीय कार्य है। दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण चुनौती है—उन लोगों के बीच विश्वास पैदा करना जो चुनाव हार जाते हैं। यह एक संवैधानिक चुनौती है।
कुरैशी के अनुसार, चुनाव प्रबंधन का मूल दर्शन बहुत स्पष्ट है: सत्ताधारी दल को विनियमन (Regulation) की आवश्यकता होती है, जबकि विपक्ष को आश्वासन (Reassurance) की। चुनाव आयोग को इन दोनों भूमिकाओं को संतुलित करना चाहिए। संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर चुनाव आयोग को कार्यपालिका के प्रभाव से दूर रखा ताकि चुनावी प्रक्रिया की अखंडता बनी रहे।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि चुनावी प्रक्रिया में 'धारणा' (Perception) उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि 'प्रक्रिया' (Process)। यदि जनता या राजनीतिक दलों को लगता है कि 'रेफरी' सत्ताधारी दल के करीब है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर हो जाती है। आयोग की स्वतंत्रता केवल कानूनी नहीं, बल्कि संस्थागत होनी चाहिए।
"एक चुनाव आयोग जिसे केवल सत्ताधारी दल का विश्वास प्राप्त है, वह उतना ही विफल है जितना कि वह जिसे केवल विपक्ष का विश्वास प्राप्त हो।"
कुरैशी ने अपने कार्यकाल के दौरान एक महत्वपूर्ण सिद्धांत का पालन किया: विपक्ष की शिकायतों को हमेशा धैर्यपूर्वक सुना जाए। उन्होंने 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव का उदाहरण दिया, जहाँ लालू प्रसाद यादव की एक छोटी सी मांग को पूरा करके उन्होंने चुनावी प्रक्रिया के प्रति विश्वास बनाए रखा। उन्होंने यह भी बताया कि कैसे तत्कालीन नेता अरुण जेटली ने भी आयोग की निष्पक्षता को स्वीकार किया था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में चुनाव आयोग की भूमिका को मजबूत करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ और अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ जैसे ऐतिहासिक मामलों में बार-बार जोर दिया है कि एक स्वतंत्र चुनाव आयोग लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे का हिस्सा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. चुनाव आयोग की स्वतंत्रता क्यों जरूरी है?
ताकि चुनाव निष्पक्ष हों और सत्ताधारी दल चुनावी मशीनरी का दुरुपयोग न कर सके।
2. 'रेगुलेशन' और 'एश्योरेंस' में क्या अंतर है?
सत्ताधारी दल को नियमों के दायरे में रखने के लिए 'रेगुलेशन' चाहिए, जबकि विपक्ष को यह भरोसा दिलाने के लिए 'एश्योरेंस' चाहिए कि उनके साथ न्याय होगा।