विपक्ष के कड़े विरोध के बीच केंद्र सरकार विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने का मन बना रही है। विपक्षी दलों का आरोप है कि यह विधेयक सरकार को गैर-सरकारी संगठनों की संपत्तियों पर असीमित अधिकार दे देगा।
मुख्य बिंदु
- केंद्र सरकार बुधवार को लोक सभा में FCRA संशोधन विधेयक को JPC के पास भेजने का प्रस्ताव ला सकती है।
- विपक्ष इस विधेयक को पूरी तरह वापस लेने की मांग कर रहा है।
- प्रस्तावित कानून के तहत, लाइसेंस रद्द होने पर NGO की संपत्ति सीधे सरकारी प्राधिकरण के पास जा सकती है।
- विपक्ष का आरोप है कि इससे अल्पसंख्यक संस्थानों और ईसाई NGOs को निशाना बनाया जा सकता है।
केंद्र सरकार ने अपने सहयोगियों और अन्य राजनीतिक दलों को सूचित किया है कि वह विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA) को गहन जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को संदर्भित करने के लिए लोक सभा में एक प्रस्ताव पेश करेगी। यह कदम उस समय उठाया जा रहा है जब कांग्रेस, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस जैसे विपक्षी दल इस विधेयक के वर्तमान स्वरूप का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।
राज्यसभा की व्यावसायिक सलाहकार समिति की बैठक में इस मुद्दे पर तीखी बहस हुई। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश और टीएमसी की सागरिका घोष ने तर्क दिया कि इस विधेयक को वापस लिया जाना चाहिए। वहीं, डीएमके नेता तिरुचि शिवा ने स्पष्ट किया कि JPC के पास भेजना कोई समाधान नहीं है, क्योंकि विधेयक का मूल ढांचा ही अस्वीकार्य है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह विधेयक केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह भारत में नागरिक समाज (Civil Society) और NGOs के संचालन के तरीके को मौलिक रूप से बदल सकता है। यदि सरकार को बिना किसी न्यायिक सुनवाई के संपत्तियों को जब्त करने का अधिकार मिलता है, तो यह लोकतांत्रिक जवाबदेही और संस्थागत स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
"FCRA में प्रस्तावित बदलाव सरकारी नियंत्रण को अत्यधिक बढ़ा सकते हैं, जिससे स्वतंत्र सामाजिक कार्यों में बाधा आने की संभावना है।"
विधेयक के सबसे विवादास्पद प्रावधानों में एक 'नामित प्राधिकरण' का निर्माण शामिल है। यदि किसी संगठन का FCRA लाइसेंस रद्द या समाप्त हो जाता है, तो उस विदेशी अंशदान से बनाई गई सभी संपत्तियां सीधे सरकार के पास चली जाएंगी। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसके लिए किसी पूर्व सुनवाई या न्यायिक निर्धारण की आवश्यकता नहीं होगी।
| विशेषता | वर्तमान नियम | प्रस्तावित संशोधन (2026) |
|---|---|---|
| संपत्ति का स्वामित्व | पुनः पंजीकरण पर दावा संभव | स्थायी रूप से सरकारी नियंत्रण |
| कानूनी प्रक्रिया | न्यायिक समीक्षा का विकल्प | बिना सुनवाई के संपत्ति हस्तांतरण |
| धन का गंतव्य | संस्था के पास सुरक्षित | भारत की संचित निधि (Consolidated Fund) |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. JPC क्या है और इसे क्यों भेजा जा रहा है?
JPC एक संयुक्त संसदीय समिति है जिसमें दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। विधेयक को यहाँ इसलिए भेजा जा रहा है ताकि विपक्ष की चिंताओं को सुना जा सके और कानून की बारीकियों की समीक्षा की जा सके।
2. इस विधेयक से NGOs पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
यदि लाइसेंस रद्द होता है, तो NGOs अपनी विदेशी फंडेड संपत्तियों को खो सकते हैं और उन्हें दोबारा प्राप्त करने का अधिकार नहीं होगा।