कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की आलोचना की है जिसमें 'उद्योग' की परिभाषा को सीमित किया गया है। जयराम रमेश ने चेतावनी दी है कि इससे श्रमिकों के सुरक्षा कवच कमजोर हो सकते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने 1978 के 'ट्रिपल टेस्ट' आधारित व्यापक परिभाषा को नए श्रम कोड के लिए सीमित कर दिया है।
- कांग्रेस ने आरोप लगाया कि इससे श्रमिकों के कानूनी संरक्षण में कमी आएगी।
- न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने बहुमत के फैसले के खिलाफ असहमति जताई है।
कांग्रेस पार्टी ने शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले पर गहरी चिंता व्यक्त की है, जो 'उद्योग' (Industry) शब्द की व्याख्या से संबंधित है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि अदालत का यह निर्णय श्रमिकों के लिए बने आवश्यक सुरक्षा उपायों को कमजोर करने का जोखिम पैदा करता है। विवाद का मुख्य केंद्र सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला है जिसमें कहा गया है कि 1978 का श्रमिक-हितैषी दृष्टिकोण नए औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (Industrial Relations Code, 2020) के तहत नए मामलों पर लागू नहीं होगा।
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के बहुमत ने 'स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम जय बी सिंह' मामले में 1978 के ऐतिहासिक 'बैंगलोर वाटर सप्लाई' मामले में निर्धारित 'ट्रिपल टेस्ट' को पुनर्गठित करने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि 'उद्योग' की व्याख्या का सीधा संबंध इस बात से है कि कौन सा व्यक्ति 'वर्कमैन' की श्रेणी में आता है और किसे श्रम कानून का संरक्षण प्राप्त है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह कानूनी बदलाव भारत के औद्योगिक परिदृश्य को मौलिक रूप से बदल सकता है। यदि 'उद्योग' की परिभाषा संकुचित होती है, तो सार्वजनिक क्षेत्र और चैरिटेबल संस्थानों में काम करने वाले लाखों कर्मचारी कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हो सकते हैं। यह निर्णय एक ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी श्रम नीतियों को आधुनिक बनाने की प्रक्रिया में है।
'उद्योग' की परिभाषा को सीमित करने से श्रम संबंधों में अनिश्चितता पैदा होगी, जो औद्योगिक शांति के लिए आवश्यक स्पष्टता के विपरीत है।
1978 के ऐतिहासिक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने तीन तत्वों की पहचान की थी: एक व्यवस्थित गतिविधि, नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सहयोग, और वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन या वितरण। उस समय यह स्पष्ट था कि लाभ कमाने का उद्देश्य न होना किसी गतिविधि को 'उद्योग' बनने से नहीं रोकता। हालांकि, 2026 के नए फैसले में 'व्यावसायिक चरित्र' (Commercial Character) की आवश्यकता जोड़कर इस दायरे को छोटा कर दिया गया है।
ऐतिहासिक संदर्भ: 1978 का लैंडमार्क फैसला
1978 का बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए राजप्पा मामला भारतीय श्रम कानून के इतिहास में एक मील का पत्थर था। इसने सुनिश्चित किया था कि केवल सरकारी या बड़े कॉर्पोरेट संस्थान ही नहीं, बल्कि वे सभी संस्थाएं जो मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए व्यवस्थित रूप से कार्य करती हैं, 'उद्योग' के दायरे में आती हैं। इससे श्रमिकों को औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत व्यापक अधिकार मिले थे।
| विशेषता | 1978 का पुराना टेस्ट (बैंगलोर वाटर सप्लाई) | 2026 का नया फैसला (औद्योगिक संबंध संहिता) |
|---|---|---|
| मुख्य आधार | व्यवस्थित गतिविधि और सहयोग | व्यावसायिक या व्यापारिक चरित्र अनिवार्य |
| लाभ का उद्देश्य | अनिवार्य नहीं था | व्यावसायिक प्रकृति पर जोर |
| सुरक्षा का दायरा | अत्यधिक व्यापक (श्रमिक-हितैषी) | संभावित रूप से संकुचित |
कांग्रेस नेता ने न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की असहमति की सराहना की, जिन्होंने चेतावनी दी थी कि स्थापित कानून को बिना ठोस कारण के बदलना न्यायिक अनिश्चितता पैदा कर सकता है। रमेश ने आशंका जताई कि यह फैसला श्रम न्यायालयों और न्यायाधिकरणों में मुकदमों की बाढ़ ला सकता है।
Frequently Asked Questions
1. 'ट्रिपल टेस्ट' क्या है? यह तीन मानदंडों का समूह है जो यह निर्धारित करता है कि कोई गतिविधि 'उद्योग' है या नहीं: व्यवस्थित कार्य, नियोक्ता-कर्मचारी सहयोग, और सेवाओं का वितरण।
2. इस फैसले का श्रमिकों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? यदि परिभाषा संकुचित होती है, तो कई कर्मचारी कानूनी सुरक्षा और विवाद निपटान तंत्र से वंचित रह सकते हैं।