रिपोर्टर्स द्वारा आयोजित इप्सोस सर्वे के अनुसार, अमेरिकी जनता में ट्रम्प की अनुमोदन दर अब ऐतिहासिक न्यूनतम पर पहुँच गई है, जबकि ईरान के खिलाफ युद्ध का समर्थन भी घट रहा है। यह परिणाम अमेरिकी राजनीति और विदेश नीति के भविष्य को पुनः आकार दे सकता है।
- ट्रम्प की अनुमोदन दर 31% पर गिरकर रिकॉर्ड न्यूनतम पर।
- ईरान के खिलाफ युद्ध का समर्थन 45% से नीचे गिरा।
- सर्वे ने दिखाया कि आर्थिक मुद्दे अब भी प्रमुख चिंता हैं।
वॉशिंगटन—रिपोर्टर्स द्वारा आयोजित इप्सोस-रोयटर्स सर्वे ने खुलासा किया कि अमेरिकी जनमत में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की अनुमोदन दर अब 31% पर स्थिर रही, जो उनके कार्यकाल की अब तक की सबसे कम दर है। इस सर्वे में 1,200 वयस्कों से बंधे प्रश्न पूछे गए, जिसमें ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई पर समर्थन भी शामिल था।
सर्वे के अनुसार, ईरान युद्ध का समर्थन 45% से नीचे गिरकर 42% पर पहुँच गया, जबकि विरोधी भावना 48% तक बढ़ी। विशेषज्ञों ने बताया कि अमेरिकी जनता की प्राथमिकता अब आर्थिक स्थिरता और घरेलू समस्याओं की ओर अधिक झुकी हुई है, न कि विदेश में सैन्य हस्तक्षेप की।
पिछले वर्ष के समान सर्वे में ट्रम्प की अनुमोदन दर लगभग 38% थी, और ईरान युद्ध के समर्थन में 55% तक था। इस गिरावट का मुख्य कारण माना जा रहा है हालिया आर्थिक नीतियों के कारण बढ़ती महंगाई और अंतरराष्ट्रीय तनाव।
बोझोकमीडिया विश्लेषण दिखाता है कि यह रुझान 2024 के राष्ट्रपति चुनावों में ट्रम्प के लिए गंभीर चुनौती पेश कर सकता है, क्योंकि कई मध्यवर्गीय मतदाता अब आर्थिक सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that declining approval combined with war fatigue could reshape the GOP’s campaign narrative, forcing candidates to pivot towards domestic issues like inflation, jobs, and healthcare.
"अमेरिकी जनता का विदेश में हस्तक्षेप के प्रति झुकाव अब इतिहास में सबसे कम स्तर पर है," कहते हैं राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. अर्चना सिंह।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या यह सर्वे सभी अमेरिकी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है?
उत्तर: हाँ, इप्सोस ने राष्ट्रीय स्तर पर विविध जनसांख्यिकी को ध्यान में रखकर सैंपलिंग किया है।
प्रश्न 2: इस गिरावट का ट्रम्प की आगामी चुनावी रणनीति पर क्या असर पड़ेगा?
उत्तर: विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प को आर्थिक मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित करना पड़ेगा, न कि विदेश नीति पर।