बेंगलुरु की एक विशेष अदालत ने आरएसएस के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोप में कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खरगे और कांग्रेस नेता मोहम्मद नलापड को जमानत दे दी है। अदालत ने दोनों को 1 लाख रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड भरने का निर्देश दिया है।
- बेंगलुरु की 42वीं विशेष अदालत ने प्रियंक खरगे और मोहम्मद नलापड को जमानत दी।
- मामला आरएसएस के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी और सोशल मीडिया पोस्ट से संबंधित है।
- अदालत ने प्रत्येक आरोपी के लिए 1 लाख रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड और 10,000 रुपये की नकद सुरक्षा निर्धारित की है।
- अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 356 के तहत यह अपराध जमानती है।
बेंगलुरु की 42वीं विशेष अदालत (निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए) ने शनिवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खरगे और कांग्रेस नेता मोहम्मद नलापड को जमानत दे दी है। यह निर्णय आरएसएस (RSS) के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणियों और सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े मानहानि मामले में आया है।
अदालत ने निर्देश दिया है कि दोनों आरोपियों को 1 लाख रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड निष्पादित करना होगा और साथ ही 10,000 रुपये की नकद सुरक्षा जमा करनी होगी। यह मामला सिद्धपुरा के ए. तेजस द्वारा दायर किया गया था, जिन्होंने आरोप लगाया था कि प्रियंक खरगे ने अक्टूबर 2025 में एक ट्वीट के माध्यम से और मोहम्मद नलापड ने एक यूट्यूब चैनल पर आरएसएस के खिलाफ अपमानजनक बातें कहीं थीं।
कानूनी प्रक्रिया और तर्क
मामले की सुनवाई के दौरान, आरोपियों के वकीलों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 478 के तहत जमानत आवेदन दायर किए। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि नकद सुरक्षा को स्वीकार किया जाए। अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 356 के तहत लगाए गए आरोप 'जमानती' प्रकृति के हैं, जिसके कारण जमानत याचिकाएं स्वीकार कर ली गईं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जमानती अपराधों में अदालत का रुख आमतौर पर उदार होता है, बशर्ते आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला राजनीतिक ध्रुवीकरण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच की बारीक रेखा को रेखांकित करता है। एक कैबिनेट मंत्री का मानहानि मामले में शामिल होना न केवल राज्य की राजनीति बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी बहस का विषय बना हुआ है। यह मामला यह भी दर्शाता है कि कैसे सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियां अब गंभीर कानूनी जांच के दायरे में आ रही हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में मानहानि के मामले अक्सर राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का हिस्सा रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से, राजनीतिक नेताओं द्वारा धार्मिक या वैचारिक संगठनों के खिलाफ की गई टिप्पणियों ने अदालतों में लंबी कानूनी लड़ाई को जन्म दिया है। हाल ही में भारतीय दंड संहिता (IPC) को बदलकर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लागू करने से कानूनी प्रक्रियाओं में नए बदलाव आए हैं।
Frequently Asked Questions
1. प्रियंक खरगे पर क्या आरोप थे?
उन पर अक्टूबर 2025 में आरएसएस सदस्यों के खिलाफ अपमानजनक ट्वीट करने का आरोप था।
2. अदालत ने जमानत के लिए क्या शर्तें रखी हैं?
अदालत ने 1 लाख रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड और 10,000 रुपये की नकद सुरक्षा की शर्त रखी है।