राजस्थान में विभिन्न दलित और आदिवासी संगठन आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण और क्रीमी लेयर को बाहर करने की मांग को लेकर लामबंद हो रहे हैं। उनका आरोप है कि आरक्षण का लाभ केवल कुछ प्रभावशाली जातियों तक ही सीमित रह गया है, जिसके लिए वे जयपुर में एक महापंचायत की योजना बना रहे हैं।

  • राजस्थान में दलित और आदिवासी संगठन एससी-एसटी श्रेणियों के भीतर उप-वर्गीकरण (कोटा के भीतर कोटा) की मांग कर रहे हैं।
  • प्रदर्शनकारियों का दावा है कि एससी की 59 जातियों में से केवल 4 और एसटी में मुख्य रूप से मीणा समुदाय ही आरक्षण का अधिकांश लाभ उठा रहे हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट के अगस्त 2024 के ऐतिहासिक फैसले के बाद इस मांग को और बल मिला है, जिसमें राज्यों को उप-वर्गीकरण की अनुमति दी गई है।

राजस्थान में आरक्षण के अधिक न्यायसंगत वितरण की मांग को लेकर आंदोलन तेज हो गया है। कई दलित और आदिवासी संगठनों ने राज्य सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है कि वे अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के भीतर उप-वर्गीकरण लागू करें। इन संगठनों का तर्क है कि स्वतंत्रता के बाद से अब तक केवल कुछ ही प्रभावशाली जातियों को आरक्षण का वास्तविक लाभ मिला है, जबकि सबसे निचले पायदान पर खड़े समुदाय आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

आरक्षण के असमान वितरण का आरोप

आरक्षण उप-वर्गीकरण संगठन के राज्य संयोजक राजेश पंचोरिया के अनुसार, राजस्थान में अनुसूचित जाति की कुल 59 जातियों में से केवल चार जातियों—कोहली, मेघवाल, जाटव और बैरवा—ने आरक्षण के बड़े हिस्से पर कब्जा कर रखा है। विधानसभा की सुरक्षित सीटों पर भी इन्हीं जातियों का दबदबा रहता है। वहीं दूसरी ओर, वाल्मीकि जैसी जातियां आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से बेहद पिछड़ी हुई हैं और उन्हें आरक्षण का उचित लाभ नहीं मिल पा रहा है।

इसी तरह, आदिवासी समाज में भी असंतोष बढ़ रहा है। भील विकास संस्थान के कार्यकर्ता अरविंद भील का कहना है कि अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों और नौकरियों का 90% से अधिक लाभ केवल मीणा समुदाय को मिलता है। भील समुदाय के कई गांवों में आज भी बिजली, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है और कुपोषण एक बड़ी समस्या बनी हुई है।

प्रभावी बनाम हाशिए पर खड़े समूहों की तुलना

नीचे दी गई तालिका राजस्थान में एससी और एसटी श्रेणियों के भीतर कथित सामाजिक-आर्थिक असमानता को दर्शाती है:

श्रेणीप्रभावशाली समूह (कथित मुख्य लाभार्थी)हाशिए पर खड़े समूह (उप-कोटा की मांग कर रहे)
अनुसूचित जाति (SC)कोहली, मेघवाल, जाटव, बैरवा (59 में से केवल 4 जातियां)वाल्मीकि और अन्य सामाजिक रूप से पिछड़े दलित समुदाय
अनुसूचित जनजाति (ST)मीणा समुदाय (कथित तौर पर 90% से अधिक लाभ)भील और अन्य पिछड़े आदिवासी समुदाय

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि राजस्थान में उप-वर्गीकरण की यह मांग केवल एक सामाजिक आंदोलन नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में राज्य की चुनावी राजनीति को पूरी तरह से बदल सकती है। यदि राज्य सरकार इस मांग को स्वीकार करती है, तो इससे कांग्रेस और बीजेपी दोनों के पारंपरिक वोट बैंक समीकरण बिगड़ सकते हैं। यही कारण है कि दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दल इस संवेदनशील मुद्दे पर सीधे तौर पर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं।

"उप-वर्गीकरण की मांग केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं है, बल्कि उन सबसे हाशिए पर पड़े लोगों के बीच आंतरिक समानता का संघर्ष है जो अपने ही साथियों द्वारा पीछे छोड़ दिए गए महसूस करते हैं।" - राजेश पंचोरिया, राज्य संयोजक

कानूनी आधार और राजनीतिक गतिरोध

राजस्थान उच्च न्यायालय के अधिवक्ता और संगठन के सदस्य विनय महार ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2024 के अपने ऐतिहासिक फैसले (पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह) में स्पष्ट किया है कि राज्य सरकारें अनुभवजन्य आंकड़ों (empirical data) के आधार पर एससी और एसटी श्रेणियों का उप-वर्गीकरण कर सकती हैं। इस फैसले ने इन वंचित समुदायों को अपनी मांग को संवैधानिक रूप से रखने का एक मजबूत आधार प्रदान किया है।

इस बीच, राजनीतिक स्तर पर खींचतान जारी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने सत्तारूढ़ भाजपा पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि भाजपा एससी, एसटी और ओबीसी का आरक्षण खत्म करना चाहती है। वहीं, आंदोलनकारी संगठनों का एक प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री वीरेंद्र कुमार से मुलाकात कर चुका है और साल के अंत तक जयपुर में एक विशाल महापंचायत आयोजित करने की तैयारी में है।

क्या आप जानते हैं?: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अगस्त 2024 के अपने ऐतिहासिक फैसले में 2004 के पुराने आदेश को पलटते हुए राज्यों को अनुभवजन्य आंकड़ों के आधार पर एससी और एसटी श्रेणियों के भीतर उप-कोटा बनाने की अनुमति दी थी।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: राजस्थान में एससी/एसटी संगठनों की मुख्य मांग क्या है?
उत्तर: वे आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण (कोटा के भीतर कोटा) लागू करने और 'क्रीमी लेयर' को बाहर करने की मांग कर रहे हैं ताकि लाभ सबसे पिछड़े उप-वर्गों तक पहुंच सके।

प्रश्न 2: सुप्रीम कोर्ट का इस मुद्दे पर क्या रुख रहा है?
उत्तर: अगस्त 2024 में, सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया कि राज्यों के पास विश्वसनीय आंकड़ों के आधार पर लक्षित आरक्षण प्रदान करने के लिए एससी और एसटी को उप-वर्गीकृत करने का अधिकार है।