केरल की महिला एवं बाल विकास मंत्री बिंदु कृष्णा ने सार्वजनिक धार्मिक आयोजनों में महिलाओं के प्रवेश और पुरुषों के साथ मेलजोल को प्रतिबंधित करने के निर्देश की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इसे लैंगिक समानता और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है।
- मंत्री बिंदु कृष्णा ने सार्वजनिक कार्यक्रमों में महिलाओं के प्रतिबंध को 'प्रतिगामी' बताया।
- यह विवाद समस्त केरल जमिय्यतुल उलमा द्वारा जारी एक सर्कुलर के बाद शुरू हुआ।
- सर्कुलर में महिलाओं को मंचों और सार्वजनिक स्थानों पर पुरुषों के साथ मिलने से रोकने का निर्देश दिया गया था।
- सीपीआई(एम) नेताओं और महिला संगठनों ने इसे सामंती प्रथा करार दिया है।
केरल की महिला एवं बाल विकास मंत्री बिंदु कृष्णा ने ऑल इंडिया जमिय्यतुल उलमा के महासचिव कांतपुरम ए.पी. अबूबकर मुसलीयार के उस निर्देश की तीखी आलोचना की है, जिसमें मुस्लिम संगठनों से सार्वजनिक धार्मिक समारोहों में महिलाओं को पुरुषों के साथ घुलने-मिलने से रोकने का आग्रह किया गया था। मंत्री ने स्पष्ट किया कि इस तरह के निर्देश महिलाओं को "सदियों पीछे" धकेल सकते हैं।
मंत्री बिंदु कृष्णा ने जोर देकर कहा कि भारत का संविधान लिंग की परवाह किए बिना महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार प्रदान करता है। उन्होंने कहा, "लोगों को स्वतंत्र और उदार जीवन जीने का अधिकार है। इस तरह के निर्देश समाज की प्रगति में बाधक हैं और एक ऐसे समाज में स्वीकार्य नहीं हैं जो समानता की गारंटी देता है।"
Why This Matters
BozokMedia analysis shows कि यह विवाद केवल एक धार्मिक निर्देश का मामला नहीं है, बल्कि यह आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों और पारंपरिक रूढ़िवादी व्याख्याओं के बीच के गहरे टकराव को दर्शाता है। जब राज्य के उच्च पदों पर बैठे प्रतिनिधि ऐसे निर्देशों का विरोध करते हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य अधिकार है।
इस विवाद की जड़ पिछले सप्ताह समस्त केरल जमिय्यतुल उलमा द्वारा जारी एक सर्कुलर में है। इस सर्कुलर में महलों और मदरसों को निर्देश दिया गया था कि धार्मिक कार्यक्रम इस्लामी मानदंडों के अनुसार हों और महिलाओं को मंचों या सार्वजनिक स्थानों पर पुरुषों के साथ बैठने की अनुमति न दी जाए। साथ ही, अन्य संस्कृतियों के रीति-रिवाजों को इस्लामी उत्सवों में शामिल न करने की सलाह दी गई थी।
लैंगिक समानता केवल कानूनी प्रावधानों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं में भी गहराई से आत्मसात किया जाना चाहिए।
इस निर्देश के खिलाफ व्यापक विरोध देखा जा रहा है। पूर्व सांसद और मंत्री पी.के. श्रीमति और पूर्व मंत्री के.के. शैलजा ने इस कदम की निंदा करते हुए इसे "सामंती प्रथा" बताया। शैलजा ने तर्क दिया कि जो संगठन शिक्षा और सामाजिक सेवा के संस्थान चलाता है, उसके लिए महिलाओं को घर तक सीमित रखने की सोच पूरी तरह अनुचित है।
दूसरी ओर, समस्ता ने अपने सर्कुलर का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने "कुछ भी नया पेश नहीं किया है" और यह निर्देश केवल उनके अनुयायियों के लिए था। संगठन का कहना है कि पैगंबर मोहम्मद के जन्मदिन के जश्न के बदलते स्वरूप, विशेष रूप से युवाओं द्वारा आयोजित सार्वजनिक कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी को लेकर उनकी चिंताएं थीं।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: विवाद का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: विवाद का मुख्य कारण समस्त केरल जमिय्यतुल उलमा का वह सर्कुलर है जिसमें धार्मिक कार्यक्रमों में महिलाओं को पुरुषों के साथ मिलने से रोकने को कहा गया था।
प्रश्न 2: मंत्री बिंदु कृष्णा का इस पर क्या स्टैंड है?
उत्तर: मंत्री का मानना है कि ऐसे निर्देश संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ हैं और महिलाओं को सामाजिक रूप से पीछे ले जाते हैं।