मद्रास उच्च न्यायालय ने डीएमके अध्यक्ष एम.के. स्टालिन की उस याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा है जिसमें उन्होंने कोलाथुर निर्वाचन क्षेत्र में 100% VVPAT पर्चियों की गिनती की मांग की है। यह मामला ईवीएम सत्यापन में विसंगतियों और चुनाव आयोग की देरी से जुड़ा है।
- मद्रास उच्च न्यायालय ने कोलाथुर सीट पर एम.के. स्टालिन की चुनावी याचिका पर आदेश सुरक्षित रखा।
- स्टालिन ने 100% VVPAT गणना और टीवीके विधायक वी.एस. बाबू के चुनाव को रद्द करने की मांग की है।
- मुख्य विवाद ईवीएम सत्यापन प्रक्रिया में देरी और तकनीकी विसंगतियों को लेकर है।
चेन्नई: मद्रास उच्च न्यायालय की प्रथम खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्मधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन शामिल हैं, ने सोमवार को डीएमके अध्यक्ष एम.के. स्टालिन द्वारा दायर एक महत्वपूर्ण रिट याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। इस याचिका में पूर्व मुख्यमंत्री ने मांग की है कि कोलाथुर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र की 100% VVPAT पर्चियों की गिनती की जाए और उन्हें विजयी घोषित किया जाए।
मामले की सुनवाई के दौरान, स्टालिन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव आयोग (ECI) ने ईवीएम के 5% सेटों के सत्यापन में अत्यधिक देरी की। सिब्बल ने तर्क दिया कि स्टालिन ने परिणामों की घोषणा के तीन दिनों के भीतर आवेदन किया था, लेकिन आयोग ने सत्यापन प्रक्रिया जुलाई के अंत में शुरू की, जो कि चुनाव याचिका दायर करने की 45 दिनों की वैधानिक समय सीमा के बाद था।
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला केवल एक सीट की जीत या हार का नहीं है, बल्कि भारत में चुनावी पारदर्शिता और ईवीएम की विश्वसनीयता पर एक बड़ा कानूनी सवाल है। यदि न्यायालय स्टालिन के पक्ष में निर्णय लेता है, तो यह भविष्य के चुनावों में VVPAT सत्यापन के लिए एक नया मिसाल कायम कर सकता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता सिब्बल ने अदालत का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि सत्यापन के दौरान गंभीर विसंगतियां पाई गईं। उन्होंने दावा किया कि एक ईवीएम यूनिट याचिकाकर्ता (स्टालिन) के नाम की पहचान करने में विफल रही, जो चुनावी प्रक्रिया की अखंडता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
"चुनाव आयोग द्वारा सत्यापन में की गई देरी ने याचिकाकर्ता को वैधानिक चुनाव याचिका दायर करने से वंचित कर दिया, जिससे अब रिट याचिका ही एकमात्र विकल्प बची है।"
दूसरी ओर, चुनाव आयोग के वकीलों ने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 329(b) और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 80 के तहत, किसी भी चुनाव को केवल 'चुनाव याचिका' (Election Petition) के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है। आयोग ने चेतावनी दी कि ऐसी रिट याचिकाओं को स्वीकार करना एक 'पेंडोरा बॉक्स' खोलने जैसा होगा, जिससे भविष्य में हजारों चुनावी परिणामों को अदालतों में चुनौती दी जा सकती है।
सुनवाई के दौरान एक अन्य रिट याचिका, जिसमें चुनाव आयोग के SOP (मानक संचालन प्रक्रिया) को चुनौती दी गई थी, को वापस ले लिया गया। न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि याचिका में 2024 के पुराने SOP को चुनौती दी गई थी, जबकि वर्तमान सत्यापन 2025 के संशोधित SOP के तहत किया गया था।
1. एम.के. स्टालिन ने अदालत से क्या मांग की है?
उन्होंने कोलाथुर सीट पर 100% VVPAT पर्चियों की गिनती कराने और खुद को निर्वाचित घोषित करने की मांग की है।
2. चुनाव आयोग का इस पर क्या तर्क है?
आयोग का कहना है कि चुनाव को चुनौती देने का एकमात्र तरीका चुनाव याचिका है, रिट याचिका नहीं।