भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) के कानूनी ढांचे को बदलने वाले विधेयक को लोकसभा अध्यक्ष ने वित्त संबंधी स्थायी समिति को सौंप दिया है। विपक्ष और संस्थान के संकाय सदस्यों के विरोध के बाद यह महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।
- भारतीय सांख्यिकी संस्थान विधेयक, 2026 को वित्त संबंधी स्थायी समिति को भेजा गया है।
- समिति को तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।
- विधेयक का उद्देश्य 1959 के पुराने कानून को बदलकर संस्थान को एक 'बॉडी कॉर्पोरेट' बनाना है।
- विपक्ष और संस्थान के प्रोफेसरों ने इस विधेयक पर गहन जांच की मांग की थी।
नई दिल्ली में मंगलवार को एक महत्वपूर्ण विधायी घटनाक्रम हुआ, जब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) विधेयक, 2026 को वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति के पास भेज दिया। इस कदम के बाद अब समिति के पास इस विधेयक की बारीकी से जांच करने और तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने का समय है।
यह विधेयक 2 अगस्त को मानसून सत्र के दौरान पेश किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य संस्थान के दायरे को विस्तृत करना और इसके कानूनी ढांचे को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना है। वर्तमान में, संस्थान 1959 के अधिनियम द्वारा संचालित है, जिसे सरकार अब अप्रासंगिक मान रही है। प्रस्तावित विधेयक संस्थान को एक 'बॉडी कॉर्पोरेट' के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य रखता है, जिससे इसकी शासन व्यवस्था और शोध क्षमताओं को मजबूती मिलेगी।
संस्थान की नई संरचना
प्रस्तावित कानून के तहत, भारत के राष्ट्रपति संस्थान के 'विजिटर' होंगे। संस्थान के नीतिगत निर्णयों के लिए एक 'बोर्ड ऑफ गवर्नर्स' का गठन किया जाएगा, जिसका नेतृत्व अकादमिक, उद्योग या सार्वजनिक नीति के क्षेत्र के किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा किया जाएगा। यह बोर्ड सीधे केंद्र सरकार के प्रति जवाबदेह होगा।
अकादमिक मामलों के लिए एक 'अकादमिक परिषद' होगी, जिसकी अध्यक्षता संस्थान के निदेशक करेंगे। इस परिषद में सभी पूर्णकालिक प्रोफेसर और संकाय सदस्य शामिल होंगे, जो संस्थान की शैक्षणिक उत्कृष्टता सुनिश्चित करेंगे।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि भारत वर्तमान में डेटा विज्ञान और सांख्यिकी के क्षेत्र में एक बड़े प्रतिभा अंतराल का सामना कर रहा है। ISI जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान को स्वायत्तता और आधुनिक कानूनी ढांचा प्रदान करना न केवल शैक्षणिक शोध के लिए, बल्कि भारत के बढ़ते तकनीकी और वित्तीय क्षेत्रों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संस्थान को एक सशक्त कानूनी पहचान देना भारत के डेटा-संचालित भविष्य के लिए एक रणनीतिक निवेश है।
ऐतिहासिक रूप से, 1959 का अधिनियम संस्थान को डिग्री देने का अधिकार देता था, लेकिन 1995 के संशोधन के बाद इसमें गणित और कंप्यूटर विज्ञान जैसे विषय जोड़े गए। हालांकि, सरकार का मानना है कि वर्तमान ढांचा अनुसंधान और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए पर्याप्त नहीं है।
Frequently Asked Questions
1. विधेयक को समिति के पास क्यों भेजा गया?
विपक्ष और संस्थान के संकाय सदस्यों द्वारा विरोध और गहन जांच की मांग के बाद, पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए इसे संसदीय समिति को भेजा गया है।
2. इस नए कानून का मुख्य लाभ क्या होगा?
यह संस्थान को अधिक स्वायत्तता देगा और डेटा वैज्ञानिकों की नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करने के लिए एक बेहतर पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करेगा।