स्वातन्त्र पार्टी के पूर्व सांसद और तमिलनाडु की राजनीति के प्रमुख व्यक्तित्व पी. रामामूर्ति का 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने 1962 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के. कामराज के खिलाफ चुनाव लड़कर राजनीतिक हलकों में सुर्खियां बटोरी थीं।
- पूर्व सांसद पी. रामामूर्ति का 93 वर्ष की आयु में विरूधुनगर के सत्तूर में निधन।
- 1962 में मात्र 29 वर्ष की आयु में उन्होंने 'अजेय' माने जाने वाले के. कामराज को चुनौती दी थी।
- 1967 में शिवकाशी लोकसभा सीट से विजयी होकर संसद पहुंचे थे।
- राजनैतिक मतभेदों के बावजूद के. कामराज के व्यक्तित्व और ईमानदारी के प्रति गहरा सम्मान रखते थे।
तमिलनाडु की राजनीति के एक साहसी चेहरे और अब समाप्त हो चुकी शिवकाशी लोकसभा सीट के पूर्व सांसद पी. रामामूर्ति का मंगलवार को उनके निवास स्थान सत्तूर (विरुधुनगर जिला) में निधन हो गया। 93 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके परिवार में उनकी पत्नी, चार पुत्र और एक पुत्री हैं। उनका अंतिम संस्कार बुधवार को सत्तूर में किया जाएगा।
एक साहसी राजनीतिक शुरुआत
पी. रामामूर्ति की राजनीतिक यात्रा की सबसे चर्चित घटना 1962 के विधानसभा चुनाव की है। उस समय मात्र 29 वर्ष के एक युवा रामामूर्ति ने वह साहस दिखाया जिसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री के. कामराज के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला किया, जिन्हें उस समय राजनीति में 'अजेय' माना जाता था। हालांकि वह चुनाव हार गए, लेकिन उनकी इस हिम्मत ने स्वातन्त्र पार्टी के भीतर उनकी पहचान बना दी और उन्हें पार्टी का एक उभरता हुआ सितारा बना दिया।
संसदीय सफलता और वैचारिक संघर्ष
1962 की हार के पांच साल बाद, स्वातन्त्र पार्टी ने उन्हें शिवकाशी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से मैदान में उतारा। इस बार रामामूर्ति ने शानदार जीत दर्ज की और लगभग 1.94 लाख वोट हासिल कर कांग्रेस उम्मीदवार पी. ए. नादर को 31,600 वोटों के अंतर से हराया। उनकी यह जीत क्षेत्र में पार्टी के बढ़ते प्रभाव का संकेत थी।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that Ramamoorthy's career reflects the volatile ideological shifts of post-independence Indian politics. His decision to quit electoral politics in 1971, when C. Rajagopalachari aligned with Kamaraj, highlights a rare instance of principled conviction over political opportunism. In an era of shifting loyalties, his refusal to compromise on his 'anti-Congress' stance marks him as a politician of high integrity.
वैचारिक मतभेद और सेवानिवृत्ति
रामामूर्ति का राजनीतिक सफर तब एक मोड़ पर आया जब स्वातन्त्र पार्टी के संस्थापक सी. राजगोपालाचारी ने 1971 के चुनावों के लिए के. कामराज के साथ गठबंधन करने का निर्णय लिया। रामामूर्ति इस फैसले को स्वीकार नहीं कर सके, क्योंकि उनकी पार्टी लंबे समय से कांग्रेस और कामराज विरोधी लहर पर काम कर रही थी। अपने सिद्धांतों से समझौता न करते हुए, उन्होंने चुनावी राजनीति को अलविदा कह दिया।
"रामामूर्ति का जीवन यह सिखाता है कि राजनीति में हार-जीत से अधिक महत्वपूर्ण वह साहस है जिससे आप अपने सिद्धांतों के लिए खड़े होते हैं।"
अपने जीवन के अंतिम दौर में, रामामूर्ति ने अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी के प्रति उदारता दिखाई। एक हालिया साक्षात्कार में उन्होंने स्वीकार किया कि के. कामराज के प्रति उनका कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं था। उन्होंने कामराज को एक "नेक इंसान" बताया जिसने राज्य के विकास के लिए बहुत कुछ किया और जिसकी छवि पूरी तरह निष्कलंक थी।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: पी. रामामूर्ति ने 1962 में किसे चुनौती दी थी?
उत्तर: उन्होंने तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री और दिग्गज नेता के. कामराज को चुनौती दी थी।
प्रश्न 2: उन्होंने चुनावी राजनीति क्यों छोड़ दी?
उत्तर: जब उनके नेता सी. राजगोपालाचारी ने के. कामराज के साथ गठबंधन किया, तो रामामूर्ति ने अपने सिद्धांतों के कारण चुनावी राजनीति छोड़ दी।