एक नाटकीय मोड़ में, मद्रास उच्च न्यायालय ने पूर्व अंबसामुद्रम विधायक एसक्की सुबया द्वारा दायर एक अतिरिक्त हलफनामे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र में प्रतिनिधित्व बहाल करने के लिए अपना इस्तीफा वापस लेना चाहा था।
- पूर्व विधायक एसक्की सुबया ने 29 अगस्त, 2026 को अध्यक्ष को अपना इस्तीफा वापस लेने के लिए एक आवेदन दिया था।
- मद्रास उच्च न्यायालय ने अतिरिक्त हलफनामे को रिकॉर्ड पर लेने से इनकार कर दिया क्योंकि मौखिक बहस पहले ही शुरू हो चुकी थी।
- यह कदम लंबी कानूनी लड़ाइयों के कारण अंबसामुद्रम निर्वाचन क्षेत्र में प्रतिनिधित्व की कमी के कारण उठाया गया था।
तमिलनाडु के राजनीतिक परिदृश्य में 1 सितंबर, 2026 को एक महत्वपूर्ण कानूनी टकराव देखा गया, जब मद्रास उच्च न्यायालय ने पूर्व अंबसामुद्रम विधायक एसक्की सुबया से जुड़े एक जटिल मामले की सुनवाई की। श्री सुबया, जिन्होंने 26 मई, 2026 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, ने तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष जे.सी.डी. प्रभाकर को सौंपे गए एक औपचारिक आवेदन के माध्यम से इस निर्णय को पलटने का प्रयास किया।
मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्मधिकारी और न्यायाधीश जी. अरुल मुरुगन की पहली डिवीजन बेंच ने एक सख्त प्रक्रियात्मक रुख अपनाया। अदालत ने श्री सुबया द्वारा दायर अतिरिक्त हलफनामे को स्वीकार करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि एक बार मौखिक बहस शुरू होने के बाद नए अभिवचनों (pleadings) की अनुमति नहीं दी जा सकती। मुख्य न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि मामला पहले ही "आंशिक रूप से सुना जा चुका है," जिससे नई प्रस्तुतियों के लिए कोई जगह नहीं बची है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णयों और निर्वाचन क्षेत्र के लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच नाजुक संतुलन को उजागर करता है। हलफनामे को स्वीकार करने से इनकार करना प्रक्रियात्मक अनुशासन के प्रति न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। अंबसामुद्रम की स्थिति विशेष रूप से गंभीर है क्योंकि मतदाता महीनों से बिना प्रतिनिधि के हैं, जिससे स्थानीय शासन और सार्वजनिक कल्याण योजनाएं ठप हो गई हैं।
अपने हलफनामे में, श्री सुबया ने स्वीकार किया कि उनका मूल इस्तीफा स्वैच्छिक और वास्तविक था। हालांकि, उन्होंने तर्क दिया कि कई मुकदमों और भारतीय चुनाव आयोग को रोकने वाले अंतरिम आदेश के कारण उपचुनाव कराने में निरंतर देरी हुई, जिससे प्रतिनिधित्व का शून्य पैदा हो गया। उन्होंने दावा किया कि उनके कर्तव्यों को फिर से संभालने का अनुरोध शुद्ध रूप से "व्यापक जनहित" में और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए किया गया था।
न्यायपालिका द्वारा अंतिम चरणों में हलफनामों को स्वीकार करने से इनकार करना कानूनी प्रक्रिया को राजनीतिक पछतावे का जरिया बनने से रोकता है।
यह मामला AIADMK व्हिप एग्री एस.एस. कृष्णमूर्ति द्वारा दायर रिट याचिकाओं के एक बड़े समूह का हिस्सा है, जिन्होंने छह AIADMK विधायकों के इस्तीफे स्वीकार करने के अध्यक्ष के निर्णय को चुनौती दी थी। अदालत ने अपना अंतिम आदेश सुरक्षित रखने से पहले वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरी, एस.आर. राजगोपाल और मेनका गुरुस्वामी सहित कई वरिष्ठ वकीलों की दलीलें सुनीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: एसक्की सुबया अपना इस्तीफा वापस क्यों लेना चाहते थे?
उन्होंने अंबसामुद्रम निर्वाचन क्षेत्र में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की कमी और विकास कार्यों में होने वाली देरी को मुख्य कारण बताया।
प्रश्न 2: मद्रास उच्च न्यायालय ने हलफनामे को किस आधार पर खारिज किया?
अदालत ने फैसला सुनाया कि आंशिक रूप से सुने गए मामले में मौखिक बहस शुरू होने के बाद नए हलफनामे या अभिवचनों की अनुमति नहीं है।