जेन ज़ी पीढ़ी को अक्सर राजनीति से उदासीन माना जाता है, लेकिन क्या यह उदासीनता स्वाभाविक है या इसे नियोजित तरीके से बनाया गया है? यह लेख छात्र राजनीति के महत्व और लोकतंत्र में इसकी भूमिका पर गहराई से विचार करता है।
- जेन ज़ी को अक्सर राजनीति से विमुख माना जाता है, लेकिन यह एक संरचनात्मक परिणाम हो सकता है।
- छात्र संघों और कैंपस लोकतंत्र की अनुपस्थिति नागरिक चेतना को कम करती है।
- नीतिगत और आर्थिक दबावों ने युवाओं को 'उपभोक्ता' में बदल दिया है, 'नागरिक' में नहीं।
- जंतर-मंतर का हालिया विरोध प्रदर्शन साबित करता है कि युवा अभी भी सक्रिय होने के लिए सही कारण की तलाश में हैं।
हाल के विधानसभा चुनावों—केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी—में एक महत्वपूर्ण पैटर्न देखा गया है: जेन ज़ी (Gen Z) पीढ़ी की चुनावी प्रक्रिया में भागीदारी। अक्सर इस पीढ़ी को 'अपोलीटिकल' या राजनीति से विमुख माना जाता है। लेकिन क्या यह सच है, या यह एक गहरी साजिश का हिस्सा है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह उदासीनता कोई संयोग नहीं है, बल्कि 1990 के दशक के बाद से बढ़ते नव-उदारवादी पूंजीवाद (Neo-liberal Capitalism) का एक रणनीतिक परिणाम है। इस प्रणाली ने नागरिक को एक 'उपभोक्ता' में बदल दिया है। जब बेरोजगारी और आवास जैसे संकटों को व्यक्तिगत विफलता के रूप में पेश किया जाता है, तो सामूहिक राजनीतिक कार्रवाई की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि जब शिक्षण संस्थानों से राजनीति को पूरी तरह से हटा दिया जाता है, तो वे केवल 'आज्ञाकारी श्रमिक' पैदा करते हैं, न कि जागरूक लोकतांत्रिक नागरिक। छात्र राजनीति का अभाव युवाओं को व्यक्तित्व पूजा (personality cults) और सोशल मीडिया द्वारा निर्मित कृत्रिम सहमति का शिकार बना देता है।
शिक्षा कोई फैक्ट्री फ्लोर नहीं है; बिना राजनीति वाला परिसर केवल आज्ञाकारी मजदूर पैदा करता है, लोकतांत्रिक नागरिक नहीं।
2026 के NEET-UG परीक्षा विवाद के दौरान जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों ने इस धारणा को तोड़ दिया। हजारों छात्रों ने न केवल सड़कों पर उतरकर अपनी ताकत दिखाई, बल्कि डिजिटल तकनीक (Bluetooth mesh networks) का उपयोग करके सरकारी इंटरनेट शटडाउन का मुकाबला भी किया। इसने साबित कर दिया कि जेन ज़ी राजनीति से दूर नहीं है, बल्कि वे केवल ऐसे कारणों की तलाश में हैं जो उनके अस्तित्व से जुड़े हों।
विडंबना यह है कि जिन राजनीतिक दलों ने छात्र आंदोलनों से अपनी पहचान बनाई, वे ही आज छात्र संघों पर प्रतिबंध लगाने में सबसे आगे हैं। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने दशकों पहले छात्र चुनावों पर रोक लगा दी थी। इसके विपरीत, केरल जैसे राज्य, जहाँ छात्र संघों का नियमित चुनाव होता है, वहां अधिक राजनीतिक रूप से साक्षर और जागरूक नागरिक तैयार होते हैं।
Frequently Asked Questions
1. क्या छात्र राजनीति केवल व्यवधान पैदा करती है?
नहीं, छात्र राजनीति लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक आवश्यक प्रशिक्षण मैदान है।
2. जेन ज़ी को राजनीति से दूर रखने में किसका हाथ है?
संरचनात्मक रूप से, नव-उदारवादी प्रणालियाँ और छात्र संघों पर प्रतिबंध लगाने वाली नीतियां इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं।