बिहार सरकार ने स्पष्ट किया है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के क्रीमी लेयर निर्धारण के लिए माता-पिता के वेतन और कृषि आय को नहीं गिना जाएगा। यह निर्णय केंद्र सरकार के हालिया रुख के बीच आया है।
- बिहार सरकार ने स्पष्ट किया कि OBC क्रीमी लेयर गणना में माता-पिता की सैलरी और खेती से होने वाली आय शामिल नहीं की जाएगी।
- यह आदेश सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा सभी जिलाधिकारियों को जारी किया गया है।
- केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में स्पष्टता मांगी है।
बिहार सरकार ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए दोहराया है कि राज्य के अधिकारियों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) उम्मीदवारों के क्रीमी लेयर स्टेटस का निर्धारण करने के लिए माता-पिता के वेतन और कृषि आय को शामिल करने की अनुमति नहीं है। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा जारी इस निर्देश में कहा गया है कि केंद्र और राज्य द्वारा जारी मौजूदा दिशा-निर्देशों के अनुसार आय परीक्षण (Income Test) के नियमों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार ने पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। केंद्र सरकार ने 'रोहित नाथन' फैसले के आलोक में आय परीक्षण लागू करने के तरीके पर स्पष्टता मांगी है। केंद्र का तर्क है कि कुछ मामलों में, दो OBC उम्मीदवारों के बीच अंतर करने के लिए माता-पिता के वेतन को शामिल करना आवश्यक हो सकता है।
क्यों है यह मामला महत्वपूर्ण?
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला आरक्षण के मूल सिद्धांतों और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बीच के संतुलन से जुड़ा है। यदि माता-पिता की आय को आधार बनाया जाता है, तो यह उन उम्मीदवारों के लिए नुकसानदेह हो सकता है जो आर्थिक रूप से तो सक्षम दिखते हैं लेकिन सामाजिक रूप से अभी भी पिछड़ा वर्ग का हिस्सा हैं।
आय परीक्षण का उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक विशेषाधिकार प्राप्त समूहों को बाहर करना है, न कि केवल आर्थिक आधार पर भेदभाव करना।
गौरतलब है कि इस वर्ष मार्च में आए रोहित नाथन फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केवल वेतन को आधार बनाकर OBC उम्मीदवारों को बाहर करना 'शत्रुतापूर्ण भेदभाव' (Hostile Discrimination) के समान है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि क्रीमी लेयर का उद्देश्य उन उम्मीदवारों को हटाना है जिन्होंने सामाजिक और आर्थिक विशेषाधिकार प्राप्त कर लिए हैं, न कि केवल आर्थिक मानदंड का उपयोग करना।
बिहार सरकार के 1 सितंबर के आदेश में 1993 के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया गया है। हालांकि, बिहार सरकार के इस आदेश में रोहित नाथन फैसले का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है, जो कानूनी विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
क्रीमी लेयर की अवधारणा को 1990 के दशक में ओबीसी आरक्षण के भीतर लाभों के समान वितरण को सुनिश्चित करने के लिए पेश किया गया था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि आरक्षण का लाभ समाज के सबसे निचले पायदान पर मौजूद लोगों को मिले और संपन्न वर्ग इसका लाभ न उठा सके।
Frequently Asked Questions
1. बिहार सरकार के इस आदेश का मुख्य प्रभाव क्या है?
इसका मुख्य प्रभाव यह है कि ओबीसी उम्मीदवारों के क्रीमी लेयर निर्धारण के लिए केवल विशिष्ट मानदंडों का उपयोग होगा और माता-पिता की सैलरी या खेती की आय को इसमें नहीं जोड़ा जाएगा।
2. रोहित नाथन मामला क्या है?
यह सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला है जिसने कहा था कि केवल आर्थिक आधार (वेतन) पर ओबीसी उम्मीदवारों को आरक्षण से बाहर करना भेदभावपूर्ण है।