पट्टाली मक्कल काची (PMK) के प्रमुख अंबुमणि रामदास ने जाति जनगणना सॉफ्टवेयर से आधिकारिक ओबीसी सूचियों को बाहर रखने के केंद्र सरकार के फैसले का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि मैन्युअल रूप से जाति दर्ज करने से डेटा में भारी विसंगतियां आएंगी, जिससे सामाजिक न्याय की प्रक्रिया प्रभावित होगी।
- पीएमके प्रमुख अंबुमणि रामदास ने जाति जनगणना सॉफ्टवेयर में मैन्युअल प्रविष्टि का कड़ा विरोध किया है।
- उन्होंने डेटा विखंडन से बचने के लिए सॉफ्टवेयर में एक पूर्व-निर्धारित ओबीसी ड्रॉपडाउन सूची शामिल करने की मांग की।
- रामदास ने चेतावनी दी कि मैन्युअल प्रविष्टि से भारत की 4,147 जातियों के लिए 46 लाख से अधिक भिन्नताएं पैदा हो सकती हैं।
पट्टाली मक्कल काची (PMK) के अध्यक्ष और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के प्रमुख सहयोगी अंबुमणि रामदास ने जाति जनगणना के लिए इस्तेमाल किए जा रहे सॉफ्टवेयर में आधिकारिक अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की सूची शामिल न करने के केंद्र सरकार के फैसले को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। उन्होंने केंद्र सरकार से इस संबंध में जारी अधिसूचना को तुरंत वापस लेने और सॉफ्टवेयर में एक पूर्व-निर्धारित ड्रॉपडाउन प्रणाली शुरू करने का आग्रह किया है ताकि जाति के विवरण सटीक रूप से दर्ज किए जा सकें।
रामदास ने एक आधिकारिक बयान में कहा कि देश में 95 वर्षों के बाद पहली बार राष्ट्रव्यापी जाति जनगणना आयोजित की जा रही है। इससे पहले आखिरी बार 1931 में पूरी आबादी को कवर करने वाली ऐसी जनगणना की गई थी। उन्होंने रेखांकित किया कि यह ऐतिहासिक अभ्यास सामाजिक न्याय संगठनों और पीएमके जैसी राजनीतिक पार्टियों के दशकों के संघर्ष और मांग के बाद शुरू हुआ है। ऐसे में इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में तकनीकी खामियों के कारण कोई बड़ी लापरवाही नहीं की जानी चाहिए।
ड्रॉपडाउन बनाम मैन्युअल प्रविष्टि का विवाद
विवाद तब शुरू हुआ जब केंद्र सरकार ने प्रगणकों (enumerators) के लिए जाति का नाम मैन्युअल रूप से दर्ज करने के लिए सॉफ्टवेयर में एक खाली स्थान (blank field) छोड़ने का फैसला किया। पीएमके इस फैसले का विरोध करने वाली पहली पार्टी थी। रामदास ने कहा, 'मैंने इस मुद्दे पर सभी ओबीसी सांसदों को पत्र लिखा था, जिसके बाद मुख्य विपक्षी दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी इसी रुख को अपनाया।' उन्होंने सरकार के इस तर्क को बेहद कमजोर और अस्वीकार्य बताया कि ओबीसी सूची में जातियों के बजाय व्यापक वर्ग शामिल हैं, जिससे भ्रम पैदा हो सकता है।
| विशेषता / पैरामीटर | मैन्युअल टेक्स्ट एंट्री (केंद्र की विधि) | पूर्व-निर्धारित ड्रॉपडाउन सूची (PMK का प्रस्ताव) |
|---|---|---|
| डेटा की सटीकता | स्पेलिंग की गलतियों और स्थानीय उपनामों के कारण त्रुटियों की भारी संभावना। | सभी राज्यों में मानकीकृत और एकसमान। |
| अनुमानित भिन्नताएं | ~4,147 जातियों के लिए 46.7 लाख से अधिक भिन्नताएं उत्पन्न हो सकती हैं। | आधिकारिक केंद्रीय/राज्य सूचियों तक सीमित। |
| सामाजिक न्याय का वितरण | खंडित डेटा के कारण कल्याणकारी योजनाओं का वितरण कमजोर हो सकता है। | आरक्षण और कल्याणकारी लाभों का सटीक और सही वितरण। |
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि डिजिटल रूप से एकत्र किए गए डेटा की शुद्धता ही भविष्य की सभी नीति-निर्माण प्रक्रियाओं का आधार बनेगी। यदि डेटा प्रविष्टि के दौरान त्रुटियां होती हैं, तो लक्षित समूहों तक आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना असंभव हो जाएगा। रामदास के अनुसार, भारत में लगभग 4,147 मान्यता प्राप्त जाति समूह हैं, लेकिन मैन्युअल प्रविष्टि के कारण वर्तनी की गलतियों और क्षेत्रीय बोलियों के चलते यह संख्या बढ़कर 46.7 लाख से अधिक हो सकती है। उन्होंने इसे 'खटमल को मारने के लिए पूरे घर को जलाने' जैसा बताया।
"इस पैमाने की राष्ट्रव्यापी जनगणना में मैन्युअल प्रविष्टियों की अनुमति देना डिजिटल गणना के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देता है, जिससे प्रशासनिक अराजकता का खतरा बढ़ जाता है।" - राजनीतिक विश्लेषक
सामाजिक न्याय और डेटा विखंडन का खतरा
पीएमके प्रमुख ने तर्क दिया कि जनगणना का मूल उद्देश्य उन लोगों तक सामाजिक न्याय पहुंचाना है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। यदि विभिन्न स्थानीय समुदायों और वर्गों को उनके विशिष्ट नामों के साथ सॉफ्टवेयर में कोडित नहीं किया गया, तो डेटा का विखंडन कल्याणकारी योजनाओं के वितरण को गंभीर रूप से बाधित करेगा। उन्होंने मांग की कि केंद्र सरकार को इस त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण को तुरंत त्यागना चाहिए और राज्य व केंद्रीय ओबीसी सूचियों को सॉफ्टवेयर में एकीकृत करना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1: पीएमके जाति जनगणना सॉफ्टवेयर में मैन्युअल एंट्री का विरोध क्यों कर रही है?
A1: पीएमके का तर्क है कि मैन्युअल प्रविष्टि से स्पेलिंग की त्रुटियां और क्षेत्रीय भिन्नताएं बढ़ेंगी, जिससे मात्र 4,147 जातियों के लिए 46 लाख से अधिक प्रविष्टियां बन जाएंगी, जो डेटा को पूरी तरह से खराब कर देंगी।
Q2: ड्रॉपडाउन सूची का उपयोग न करने के पीछे केंद्र का क्या तर्क है?
A2: सरकारी अधिकारियों का दावा है कि केंद्रीय और राज्य ओबीसी सूचियों में कड़ाई से परिभाषित 'जातियों' के बजाय व्यापक 'वर्ग' और स्थानीय समूह शामिल हैं, जिससे तकनीकी भ्रम पैदा हो सकता है।