भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद, चंडीगढ़ प्रशासन ने पेरिस में चंडीगढ़ की ऐतिहासिक वस्तुओं की नीलामी रोकने के लिए कदम उठाए हैं। केंद्र ने प्रशासन को याद दिलाया कि विरासत संरक्षण समिति का निर्माण ही इन वस्तुओं की चोरी रोकने के लिए किया गया था।

  • पेरिस में चंडीगढ़ की ऐतिहासिक वस्तुओं की नीलामी रोकने के लिए प्रशासन ने एफआईआर दर्ज की।
  • संस्कृति मंत्रालय ने चंडीगढ़ विरासत संरक्षण समिति (CHCC) की भूमिका को दोहराया।
  • ASI के पास 1972 के कानून के तहत सीमित अधिकार होने के बावजूद केंद्र ने प्रशासनिक कार्रवाई के निर्देश दिए।
  • विरासत संरक्षण सेल के पुनरुद्धार और वस्तुओं को 'कला खजाना' घोषित करने की मांग की गई है।

चंडीगढ़ की अनमोल विरासत को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बिकने से बचाने के लिए केंद्र सरकार के एक कड़े निर्देश ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है। लंबे समय के इंतजार के बाद, संस्कृति मंत्रालय के एक पत्र ने चंडीगढ़ प्रशासन को उन ऐतिहासिक वस्तुओं की नीलामी रोकने के लिए मजबूर किया, जो फ्रांस के पेरिस में नीलाम की जाने वाली थीं।

संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल द्वारा चंडीगढ़ के उपराज्यपाल सलाहकार राजेश प्रसाद को भेजे गए इस पत्र में स्पष्ट किया गया कि चंडीगढ़ विरासत संरक्षण समिति (CHCC) का गठन ही इसलिए किया गया था ताकि शहर की बेशकीमती वस्तुओं को विदेशी खरीदारों के हाथों जाने से रोका जा सके। यह मामला तब गरमाया जब पेरिस की 'फ्रांस्वा एपिन नीलामी' (Francois Epin Auction) में चंडीगढ़ की प्रसिद्ध विरासत वस्तुओं को सूचीबद्ध किया गया।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल फर्नीचर की नीलामी का नहीं है, बल्कि यह एक शहर की पहचान और उसकी ऐतिहासिक अखंडता का है। जब स्थानीय प्रशासन ऐतिहासिक संपदा की निगरानी करने में विफल रहता है, तो वैश्विक बाजार इन कलाकृतियों को लूटने का अवसर पा लेते हैं। केंद्र का यह हस्तक्षेप प्रशासनिक शिथिलता के खिलाफ एक चेतावनी है।

चंडीगढ़ की विरासत को केवल सजावट की वस्तु नहीं, बल्कि शहर के वास्तुशिल्प इतिहास का जीवंत हिस्सा माना जाना चाहिए।

हैरानी की बात यह है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इस मामले में कानूनी कार्रवाई करने में असमर्थता जताई थी। इसका कारण यह है कि ये वस्तुएं 'पुरावशेष और कला खजाना अधिनियम, 1972' के तहत 'पुरावशेष' (Antiquity) की श्रेणी में नहीं आती हैं। हालांकि, केंद्र ने स्पष्ट किया कि कानून की इस सीमा के बावजूद, गृह मंत्रालय के 2011 के निर्देशों के तहत चंडीगढ़ प्रशासन के पास इन वस्तुओं को बचाने की पूरी जिम्मेदारी है।

विरासत संरक्षण सेल के सदस्य अजय जगगा ने इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने मांग की है कि चंडीगढ़ की इन वस्तुओं को आधिकारिक रूप से 'कला खजाना' (Art Treasure) घोषित किया जाए ताकि भविष्य में इनके निर्यात पर कानूनी रोक लगाई जा सके। इसके साथ ही, उन्होंने 'हेरिटेज आइटम प्रोटेक्शन सेल' (HIPC) को पुनर्जीवित करने की भी अपील की है।

वर्तमान में, चंडीगढ़ प्रशासन ने पेरिस में नीलामी रोकने के लिए एफआईआर दर्ज करने और विदेश मंत्रालय (MEA) तथा पेरिस में भारतीय दूतावास के साथ समन्वय स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह कदम शहर के स्थापत्य इतिहास, विशेष रूप से ले कोर्बुज़िए और पियरे जेनेरेट द्वारा डिजाइन की गई वस्तुओं को सुरक्षित करने के लिए महत्वपूर्ण है।

Did You Know?: चंडीगढ़ के कई प्रसिद्ध फर्नीचर डिजाइन ले कोर्बुज़िए और पियरे जेनेरेट जैसे विश्व प्रसिद्ध वास्तुकारों की देन हैं, जो अब वैश्विक नीलामी घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

Frequently Asked Questions

1. चंडीगढ़ प्रशासन ने पेरिस में नीलामी रोकने के लिए क्या किया?
प्रशासन ने एफआईआर दर्ज की है और पेरिस में भारतीय दूतावास तथा विदेश मंत्रालय के साथ मिलकर कार्रवाई शुरू की है।

2. ASI इस मामले में कार्रवाई क्यों नहीं कर सका?
क्योंकि ये वस्तुएं 'पुरावशेष और कला खजाना अधिनियम, 1972' के तहत तकनीकी रूप से 'पुरावशेष' की श्रेणी में नहीं आती हैं।