भारत में महिलाओं के लिए शुरू की गई बिना शर्त नकद हस्तांतरण (UCT) योजनाएं आर्थिक सहायता तो प्रदान करती हैं, लेकिन लाभार्थियों की पहचान में होने वाली गलतियां सरकारों के लिए भारी राजनीतिक जोखिम पैदा कर रही हैं।

  • बिना शर्त नकद हस्तांतरण (UCT) भारत में एक प्रमुख चुनावी रणनीति बन गया है।
  • लाभार्थियों की पहचान (Inclusion/Exclusion errors) सरकारों के लिए बड़ा राजनीतिक जोखिम है।
  • अर्थशास्त्र लक्षित सहायता का पक्ष लेता है, जबकि राजनीति व्यापक समावेश का।
  • शिक्षा या स्वास्थ्य से जुड़ी 'सशर्त' योजनाएं अधिक टिकाऊ विकल्प हो सकती हैं।

भारत में पिछले कुछ वर्षों में बिना शर्त नकद हस्तांतरण (Unconditional Cash Transfer - UCT) योजनाएं चुनावी राजनीति का एक अनिवार्य हिस्सा बन गई हैं। विशेष रूप से महिला मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए तमिलनाडु की कलाइग्नार மகளிர் उरमै थिट्टम, पश्चिम बंगाल की लक्ष्मी भंडार और कर्नाटक की गृह लक्ष्मी योजना जैसी योजनाएं बड़े पैमाने पर लागू की गई हैं। हालांकि, आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, 2025-26 में राज्यों द्वारा इन योजनाओं पर लगभग $18 बिलियन खर्च किए जाने का अनुमान है।

क्या 'मुफ्त उपहार' लोकतंत्र के लिए जोखिम हैं?

यद्यपि ये योजनाएं महिलाओं के अवैतनिक घरेलू कार्य को मान्यता देकर सतत विकास लक्ष्य (SDG) 5.4 की दिशा में एक कदम हैं, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि ये केवल चुनावी 'मुफ्त उपहार' (Freebies) बनकर रह गई हैं। इन योजनाओं के वित्तपोषण के लिए अक्सर राजकोषीय घाटे में वृद्धि करनी पड़ती है, जिससे रोजगार सृजन और उत्पादक निवेश जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए उपलब्ध संसाधन कम हो जाते हैं। एक बार जब परिवार इन नकद हस्तांतरणों पर निर्भर हो जाते हैं, तो राजनीतिक दलों के लिए इन्हें वापस लेना लगभग असंभव हो जाता है।

लक्ष्य निर्धारण की बड़ी समस्या: समावेश और बहिष्कार की त्रुटियां

UCT कार्यक्रमों की सबसे बड़ी चुनौती लाभार्थियों की सही पहचान करना है। चूंकि अनौपचारिक क्षेत्र के अधिकांश श्रमिकों की आय का सटीक डेटा उपलब्ध नहीं है, इसलिए सरकारें भूमि स्वामित्व, बिजली की खपत या घरेलू संपत्ति जैसे संकेतकों पर निर्भर करती हैं। इससे दो प्रकार की त्रुटियां होती हैं: समावेशन त्रुटि (Inclusion Error), जहाँ अपात्र लोग लाभ प्राप्त कर लेते हैं, और बहिष्करण त्रुटि (Exclusion Error), जहाँ पात्र लोग छूट जाते हैं।

राजनीति केवल वास्तविक प्रशासनिक गलतियों से नहीं, बल्कि 'कथित' गलतियों से भी प्रभावित होती है, जहाँ लोग महसूस करते हैं कि उनके साथ अन्याय हुआ है।

तमिलनाडु की कलाइग्नार மகளிர் उरमै थिट्टम इसका सटीक उदाहरण है। चुनावी वादों के विपरीत, राजकोषीय सीमाओं के कारण पात्रता मानदंडों को सीमित किया गया, जिससे व्यापक असंतोष पैदा हुआ। इसी तरह, पश्चिम बंगाल की लक्ष्मी भंडार योजना में भी अपात्रों को शामिल करने के आरोप लगे। BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि ये त्रुटियां केवल प्रशासनिक विफलता नहीं हैं, बल्कि चुनाव परिणामों को बदलने की क्षमता रखती हैं।

Why This Matters

यह मुद्दा अर्थशास्त्र और राजनीति के बीच के अंतर्निहित तनाव को उजागर करता है। जहाँ अर्थशास्त्र सीमित संसाधनों के कुशल उपयोग के लिए 'लक्षित' (Targeted) कार्यक्रमों का समर्थन करता है, वहीं राजनीति 'व्यापक समावेश' का पुरस्कार देती है। मतदाता केवल लाभ प्राप्त करने से ही नहीं देखते, बल्कि वे उन लोगों द्वारा भी आंके जाते हैं जिन्हें वे मानते हैं कि उन्हें गलत तरीके से लाभ से वंचित रखा गया है।

Did You Know?: तमिलनाडु की 'मिड-डे मील योजना' को एक सफल मॉडल माना जाता है क्योंकि यह शिक्षा से जुड़ी है, जिससे लाभार्थियों के बीच भेदभाव की भावना कम होती है।

Frequently Asked Questions

1. UCT योजनाओं का मुख्य आर्थिक जोखिम क्या है?
इनका मुख्य जोखिम राजकोषीय घाटा बढ़ाना और उत्पादक निवेश (जैसे रोजगार सृजन) के लिए उपलब्ध धन को कम करना है।

2. 'बहिष्करण त्रुटि' (Exclusion Error) क्या है?
जब सरकारी मानदंडों के कारण कोई वास्तव में पात्र व्यक्ति लाभ प्राप्त करने से वंचित रह जाता है, तो उसे बहिष्करण त्रुटि कहा जाता है।

योजना का नामराज्यमुख्य चुनौती
लक्ष्मी भंडारपश्चिम बंगालअपात्रों का समावेश
गृह लक्ष्मी योजनाकर्नाटकबहिष्करण त्रुटियां
कलाइग्नार மகளிர் उरमै थिट्टमतमिलनाडुपात्रता मानदंड और असंतोष