तमिलनाडु के सामाजिक न्याय मंत्री वन्नी आरसू ने विधानसभा में घोषणा की है कि राज्य भर में पंचमी जमीनों की पहचान करने के लिए जल्द ही एक विशेष आयोग बनाया जाएगा। यह कदम आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए उठाया जा रहा है।

  • तमिलनाडु सरकार पंचमी जमीनों की पहचान के लिए एक विशेष आयोग बनाएगी।
  • ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, 12 लाख एकड़ में से अब केवल 1.86 लाख एकड़ भूमि शेष है।
  • यह आयोग आदिवासी समुदायों के लिए आरक्षित भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

तमिलनाडु सरकार ने राज्य भर में पंचमी जमीनों (Panchami lands) की पहचान करने के लिए एक विशेष आयोग गठित करने का निर्णय लिया है। सामाजिक न्याय मंत्री वन्नी आरसू ने सोमवार को विधानसभा में इस महत्वपूर्ण घोषणा की। यह कदम उन आदिवासी समुदायों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिनके लिए ये भूमि ऐतिहासिक रूप से आरक्षित रही है।

विधानसभा में अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान, CPI विधायक के. मारिमथु ने इन जमीनों की वसूली के लिए एक अलग बोर्ड बनाने की मांग की थी। इसके जवाब में, मंत्री आरसू ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित विशेष आयोग पिछले सभी पैनलों की तुलना में अधिक प्रभावी होगा और जमीनों की पहचान एवं संरक्षण में तेजी लाएगा।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

पंचमी भूमि का मुद्दा काफी पुराना है। मंत्री ने बताया कि इसकी जड़ें 1891 तक जाती हैं, जब तत्कालीन चेंगलपट्टू कलेक्टर ने इन जमीनों की पहचान की थी और इंग्लैंड की महारानी को पत्र लिखा था। इसके बाद, दो सरकारी आदेश जारी किए गए, जिसके तहत लगभग 12 लाख एकड़ बंजर भूमि विशेष रूप से आदिवासी समुदायों के लिए आवंटित की गई थी।

हालांकि, समय के साथ इस भूमि का स्वरूप बदल गया। आरटीआई (RTI) से प्राप्त जानकारी के अनुसार, जो भूमि कभी 12 लाख एकड़ थी, वह अब घटकर मात्र 1.86 लाख एकड़ रह गई है। यह भारी कमी भूमि के अतिक्रमण और गलत प्रबंधन की ओर इशारा करती है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि पंचमी भूमि का मुद्दा केवल भूमि प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय और आदिवासी अधिकारों से गहराई से जुड़ा है। भूमि की कमी का सीधा असर आदिवासी समुदायों की आजीविका और उनके सांस्कृतिक अस्तित्व पर पड़ता है।

पंचमी भूमि की पहचान में देरी ने दशकों तक आदिवासी समुदायों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखा है।

मंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि 1996 में एक समिति बनाई गई थी, लेकिन वह गति खो बैठी। इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि और जयललिता के कार्यकाल में भी विभिन्न समितियां बनीं, लेकिन वे पूरी तरह सफल नहीं हो सकीं। अब सरकार इस मुद्दे को निर्णायक रूप से हल करने के लिए तैयार है।

Did You Know?: पंचमी भूमि का इतिहास 19वीं सदी के ब्रिटिश काल से जुड़ा है, जिसे विशेष रूप से आदिवासियों के कल्याण के लिए आरक्षित किया गया था।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: पंचमी भूमि क्या है?
उत्तर: यह वह भूमि है जिसे विशेष रूप से आदिवासी समुदायों के उपयोग और उनके कल्याण के लिए आरक्षित किया गया है।

प्रश्न 2: वर्तमान में कितनी पंचमी भूमि बची है?
उत्तर: आरटीआई के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में केवल 1.86 लाख एकड़ भूमि शेष है।