तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने विधानसभा में डीएमके सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते हुए 50 साल पुराने सक्करिया आयोग का मुद्दा फिर से गरमा दिया है। जानिए क्या था यह आयोग और क्यों यह आज भी राजनीति का केंद्र बना हुआ है।

  • मुख्यमंत्री विजय ने विधानसभा में डीएमके के खिलाफ भ्रष्टाचार के पुराने आरोपों को फिर से उठाया।
  • सक्करिया आयोग 1970 के दशक में डीएमके शासन के दौरान भ्रष्टाचार की जांच के लिए बनाया गया था।
  • आयोग ने वीरानम जलाशय परियोजना सहित कई महत्वपूर्ण मामलों में अनियमितताओं की बात कही थी।
  • यह विवाद एमजीआर, जयललिता और अब विजय के माध्यम से राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बना हुआ है।

तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर इतिहास के पन्ने पलट गए हैं। मुख्यमंत्री विजय ने विधानसभा में बोलते हुए 1970 के दशक के चर्चित सक्करिया आयोग (Sarkaria Commission) का जिक्र किया, जिसने डीएमके सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को फिर से जीवित कर दिया है। विजय ने तर्क दिया कि इस आयोग की रिपोर्ट में ऐसे कई तथ्य हैं जो दशकों बाद भी शासन की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हैं।

यह विवाद तब शुरू हुआ जब विधानसभा में पुलिस और अग्निशमन विभाग के अनुदान मांगों पर चर्चा हो रही थी। विजय ने 1970 के दशक में एक संस्था को वीरानम जलाशय परियोजना के लिए पाइप बिछाने का टेंडर देने के मामले का हवाला देते हुए डीएमके पर निशाना साधा। यह वही मामला है जिसे दशकों से एडीएमके (AIADMK) नेताओं ने राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: विवाद की जड़ें

सक्करिया आयोग की कहानी 1967 के बाद की है जब डीएमके ने सत्ता संभाली थी। 1971 में विधानसभा भंग होने के बाद, एमजीआर और करुणानिधि के बीच राजनीतिक मतभेद गहरा गए। एमजीआर के डीएमके से अलग होकर एडीएमके बनाने के बाद, उन्होंने तत्कालीन राज्यपाल के माध्यम से डीएमके मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए।

जब तत्कालीन राष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने हस्तक्षेप किया, तो 1976 में आपातकाल के दौरान करुणानिधि की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। इसी दौरान, 28 भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए न्यायमूर्ति आर.एस. सक्करिया की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि सक्करिया आयोग केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपकरण रहा है। यह दिखाता है कि कैसे दशकों पुराने भ्रष्टाचार के आरोप आज भी नई पीढ़ी के नेताओं के लिए राजनीतिक विमर्श का आधार बनते हैं।

सक्करिया आयोग की रिपोर्ट ने तमिलनाडु की राजनीति में 'भ्रष्टाचार बनाम विकास' की बहस को एक नया आयाम दिया है।

आयोग ने वीरानम जलाशय के अलावा हवाई कीटनाशक छिड़काव अनुबंध, समयनाल्लूर पावर स्टेशन की बिक्री और धान खरीद जैसे कई मामलों की जांच की। हालांकि, डीएमके ने हमेशा इन आरोपों को खारिज किया है और आयोग की रिपोर्ट को एकतरफा बताया है।

मामलाआरोप का विषयआयोग का निष्कर्ष
वीरानम परियोजनापाइप बिछाने के टेंडर में अनियमितताअनियमितता के संकेत
कीटनाशक अनुबंधहवाई छिड़काव अनुबंध में भ्रष्टाचारजांच के अधीन
बिजली संयंत्रसमयनाल्लूर संयंत्र की बिक्रीप्रक्रियात्मक खामियां
Did You Know?: सक्करिया आयोग की जांच रिपोर्ट चार विस्तृत खंडों में विभाजित थी और यह एक साल से अधिक समय तक चली थी।

Frequently Asked Questions

1. सक्करिया आयोग क्या था?
यह 1970 के दशक में डीएमके सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए गठित एक न्यायिक आयोग था।

2. मुख्यमंत्री विजय ने इसका उल्लेख क्यों किया?
विजय ने डीएमके पर भ्रष्टाचार के पुराने पैटर्न को उजागर करने और अपनी सरकार की पारदर्शिता सिद्ध करने के लिए इसका संदर्भ दिया।