तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने विधानसभा में 1970 के दशक के भ्रष्टाचार के आरोपों को उठाते हुए सरकारिया आयोग की रिपोर्ट का जिक्र किया है। यह विवाद पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि और वीरनम जल आपूर्ति परियोजना से जुड़ा है।
- मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने विधानसभा बहस के दौरान 1976 की सरकारिया आयोग की रिपोर्ट को फिर से चर्चा में लाया।
- आयोग ने पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि और उनके कैबिनेट सहयोगियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के 28 आरोपों की जांच की थी।
- रिपोर्ट में कीटनाशक छिड़काव अनुबंधों में 'अवैध लाभ' और वीरनम परियोजना में अनियमितताओं की पुष्टि की गई थी।
तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर पुराने जख्म हरे हो गए हैं। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने विधानसभा में गृह पोर्टफोलियो के अनुदान की मांग पर बहस के दौरान सरकारिया आयोग की जांच का उल्लेख किया। इस कदम ने 1970 के दशक के उन भ्रष्टाचार के आरोपों को पुनर्जीवित कर दिया है, जो DMK के सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहे एम. करुणानिधि और उनके तत्कालीन कैबिनेट मंत्रियों से जुड़े थे।
सरकारिया आयोग की स्थापना और पृष्ठभूमि
इस आयोग का गठन फरवरी 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा किया गया था, जब देश आपातकाल (Emergency) के दौर से गुजर रहा था। जस्टिस आर.एस. सरकारिया की अध्यक्षता में गठित इस पैनल को करुणानिधि और उनके सहयोगियों के खिलाफ सत्ता के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के 28 आरोपों की जांच का जिम्मा सौंपा गया था। यह घटनाक्रम उस समय आया जब केंद्र सरकार ने राज्यपाल के.के. शाह की रिपोर्ट के आधार पर DMK सरकार को बर्खास्त कर दिया था।
1970 के दशक का राजनीतिक संघर्ष
DMK सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को हवा देने में एम.जी. रामचंद्रन (MGR) की भूमिका अहम थी। 1972 में सार्वजनिक जीवन में शुचिता के मुद्दे पर DMK छोड़ने के बाद, MGR ने AIADMK की स्थापना की और राज्यपाल को भ्रष्टाचार के विस्तृत ज्ञापन सौंपे। इसके अलावा, के. कामराज के नेतृत्व वाले कांग्रेस (संगठन) और कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी DMK सरकार की कड़ी आलोचना की थी।
50 साल बाद सरकारिया रिपोर्ट का उल्लेख करना कानूनी कार्रवाई से ज्यादा तमिलनाडु की वर्तमान सत्ता संरचना में एक रणनीतिक नैरेटिव बदलने की कोशिश है।
मुख्य आरोप और वीरनम परियोजना
आयोग के सामने कई गंभीर आरोप थे, जिनमें तिरुवरुर में एक आयातित ट्रैक्टर का निजी उपयोग और करीबी दोस्तों को ब्रुअरी लाइसेंस देना शामिल था। हालांकि, वीरनम जल आपूर्ति परियोजना, चीनी सौदों और लिफ्ट सिंचाई योजनाओं में भ्रष्टाचार के आरोप सबसे अधिक विवादित रहे। जांच में यह देखा गया कि क्या राज्य मशीनरी का उपयोग DMK समर्थित ट्रेड यूनियनों और निजी हितों को लाभ पहुँचाने के लिए किया गया था।
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि इन रिपोर्टों को दोबारा सामने लाना DMK की विरासत को चुनौती देने का एक राजनीतिक हथियार है। कीटनाशक छिड़काव अनुबंधों में ₹5.75 लाख के 'अवैध लाभ' जैसे ऐतिहासिक तथ्यों को जोड़कर, वर्तमान प्रशासन पारदर्शिता और जवाबदेही का एक ऐसा विमर्श तैयार करना चाहता है जो दशकों पुराना होने के बावजूद प्रभावी हो।
| मामला/इकाई | आरोप | आयोग का निष्कर्ष |
|---|---|---|
| कीटनाशक छिड़काव | विमान ऑपरेटरों से रिश्वत | स्थापित (अवैध लाभ) |
| वीरनम परियोजना | जल आपूर्ति बुनियादी ढांचे में भ्रष्टाचार | आंशिक/पूर्ण रूप से सिद्ध |
| आयातित ट्रैक्टर | राज्य उपहार का निजी उपयोग | जांच के दायरे में/नोट किया गया |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: सरकारिया आयोग के अध्यक्ष कौन थे?
आयोग की अध्यक्षता रिटायर्ड जस्टिस आर.एस. सरकारिया ने की थी, जो नियुक्ति के समय सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश थे।
प्रश्न 2: इस संदर्भ में वीरनम परियोजना का क्या महत्व है?
वीरनम परियोजना उन प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में से एक थी जहाँ आयोग ने सत्ता के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के सबूत पाए थे।