कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी के भीतर एक बड़ा वैचारिक टकराव उभर आया है। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य सरकार पर दबाव डालते हुए जातिगत सर्वे रिपोर्ट लागू करने और आरक्षण को बढ़ाकर 75% करने की मांग की है, जिससे मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के लिए राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है।
- पूर्व सीएम सिद्धारमैया ने दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के लिए 75% आरक्षण की मांग की है।
- यह मांग मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।
- कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर 2027 की जनगणना में जातिगत गणना को मुद्दा बना रही है, लेकिन कर्नाटक में आंतरिक मतभेद सामने आए हैं।
कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर जातिगत समीकरणों ने हलचल पैदा कर दी है। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य सरकार से मांग की है कि पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष जयप्रकाश हेगड़े द्वारा सौंपी गई जातिगत सर्वे रिपोर्ट को तुरंत लागू किया जाए। सिद्धारमैया का तर्क है कि सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की सीमा को बढ़ाकर 75 प्रतिशत करना अनिवार्य है।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मांग उस समय आई है जब मई में सत्ता की कमान डीके शिवकुमार के हाथों में सौंपी गई थी। सिद्धारमैया, जो कुरुबा समुदाय से आते हैं और 'अहिंडा' (AHINDA) गठबंधन के मुख्य चेहरा हैं, का यह कदम शिवकुमार के लिए असहज स्थिति पैदा कर रहा है, जो प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that this is not merely a policy demand but a strategic power play within the Karnataka Congress. By pushing for 75% reservation, Siddaramaiah is consolidating his base among the backward classes, potentially creating a divide between the AHINDA bloc and the dominant Vokkaliga leadership under DK Shivakumar. This internal friction could weaken the party's cohesion ahead of future electoral battles.
"The tension between the AHINDA leadership and the Vokkaliga influence reflects a deeper struggle for the soul of the Congress party in Karnataka—balancing social justice with the interests of dominant landed castes."
कर्नाटक में जातिगत सर्वे का इतिहास काफी जटिल रहा है। 2015 में सिद्धारमैया के पहले कार्यकाल के दौरान एच. कांथाराज की अध्यक्षता में एक सर्वे किया गया था, लेकिन लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों के कड़े विरोध के कारण उसे सदन में पेश नहीं किया जा सका। 2023 में दोबारा सत्ता में आने के बाद, पुराने डेटा पर सवाल उठे और एक नया सर्वे कराया गया, जिसकी रिपोर्ट अब लागू करने की मांग की जा रही है।
राष्ट्रीय स्तर पर, कांग्रेस पार्टी 2027 की जनगणना को एक बड़े हथियार के रूप में देख रही है। राहुल गांधी लगातार यह तर्क दे रहे हैं कि जब तक हर समुदाय की सटीक संख्या ज्ञात नहीं होगी, तब तक संसाधनों और प्रतिनिधित्व का उचित बंटवारा संभव नहीं है। हालांकि, कर्नाटक में अपनी ही सरकार के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद होना पार्टी की राष्ट्रीय रणनीति के लिए विरोधाभासी स्थिति पैदा करता है।
| विशेषता | सिद्धारमैया का दृष्टिकोण (AHINDA) | डीके शिवकुमार की स्थिति (Vokkaliga) |
|---|---|---|
| आरक्षण लक्ष्य | 75% तक वृद्धि की मांग | सावधानीपूर्वक कार्यान्वयन/हिचकिचाहट |
| मुख्य आधार | पिछड़े वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक | प्रभावशाली कृषि समुदाय (वोक्कालिगा) |
| रणनीति | जातिगत सर्वे रिपोर्ट का तत्काल कार्यान्वयन | राजनीतिक स्थिरता और संतुलन बनाए रखना |
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: सिद्धारमैया ने 75% आरक्षण की मांग क्यों की है?
उत्तर: उनका मानना है कि सामाजिक न्याय और संसाधनों के उचित वितरण के लिए दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को उनकी आबादी के अनुसार प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
प्रश्न 2: इस मांग से डीके शिवकुमार की मुश्किलें क्यों बढ़ गई हैं?
उत्तर: क्योंकि आरक्षण बढ़ाने से वोक्कालिगा और लिंगायत जैसे प्रभावशाली समुदायों में असंतोष पैदा हो सकता है, जिससे सरकार की स्थिरता पर असर पड़ सकता है।