पूर्व संयुक्त राष्ट्र उप महासचिव लक्ष्मी पुरी ने ग्लोरिया स्टीनम के जीवन और उनके नारीवादी आंदोलनों के प्रभाव का विश्लेषण किया है, जो आज भी महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को प्रेरित कर रहे हैं।
- ग्लोरिया स्टीनम ने नारीवाद को एक वैश्विक सार्वजनिक हित के रूप में परिभाषित किया।
- उन्होंने पितृसत्तात्मक संरचनाओं को पहचानने और उन्हें चुनौती देने के लिए महिलाओं को प्रेरित किया।
- भारतीय नारीवाद केवल पश्चिमी प्रभाव नहीं, बल्कि सावित्रीबाई फुले और रानी लक्ष्मीबाई जैसी शख्सियतों का मिश्रण है।
ग्लोरिया स्टीनम का सबसे बड़ा योगदान मानवता के सबसे महत्वपूर्ण और नेक प्रोजेक्ट्स में से एक—समानता—को आवाज देना था। उन्होंने न केवल अन्याय को उजागर किया, बल्कि असंतोष की उस आग को प्रज्वलित किया जिसने दुनिया भर की महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना सिखाया। स्टीनम ने नारीवाद को किसी एक राजनीतिक दल के प्रोजेक्ट के बजाय एक 'ग्लोबल पब्लिक गुड' (वैश्विक सार्वजनिक हित) बनाया, जहाँ नारीवाद का अर्थ स्त्री और पुरुष दोनों की मानवता और समानता को स्वीकार करना है।
लेखिका लक्ष्मी पुरी याद करती हैं कि 1970 के दशक में जब वे लेडी श्री राम कॉलेज (LSR) में थीं, तब नारीवाद की दूसरी लहर उफान पर थी। उस समय के प्रमुख विचारकों जैसे केट मिलेट और जर्मेन ग्रीर की रचनाओं ने समाज की स्थापित मान्यताओं को हिला दिया था। भारतीय संदर्भ में, नारीवाद के तीन मुख्य प्रवाह देखे गए: उदारवादी नारीवाद (जो सत्ता संरचनाओं में एकीकरण चाहता था), कट्टरपंथी नारीवाद (जो समाज के पूर्ण पुनर्गठन की मांग करता था), और सांस्कृतिक नारीवाद (जो महिलाओं के विशिष्ट गुणों के मूल्य की वकालत करता था)।
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि स्टीनम का प्रभाव केवल शब्दों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने 'शारीरिक स्वायत्तता' (Bodily Autonomy) को नारीवाद की बुनियाद बनाया। उन्होंने यह दिखाया कि कैसे पितृसत्ता को 'परंपरा' का मुखौटा पहनाकर सामान्य बना दिया गया था। जब हम आज वेतन विसंगतियों, राजनीतिक बहिष्कार और प्रजनन स्वतंत्रता की बात करते हैं, तो हम वास्तव में उन संरचनाओं को चुनौती दे रहे होते हैं जिन्हें स्टीनम ने दशकों पहले नाम दिया था।
नारीवाद केवल पुरुषों के खिलाफ युद्ध नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ युद्ध है जो मानवता के एक बड़े हिस्से को कमतर आंकती है।
दिलचस्प बात यह है कि स्टीनम का भारत से गहरा नाता था। उन्होंने चेस्टर बोल्स एशियन फेलोशिप के दौरान मिरांडा हाउस में समय बिताया और गांधीवादी विचारकों के साथ संवाद किया। भारत उनके बौद्धिक विकास का हिस्सा बना, और बाद में उनके विचार भारत की महिलाओं तक पहुँचे। हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि भारतीय नारीवाद केवल एक पश्चिमी आयात नहीं था। यहाँ अहिल्याबाई होलकर, सावित्रीबाई फुले और सरोजिनी नायडू जैसी महिलाओं ने पहले ही 'नारी शक्ति' की नींव रख दी थी।
लक्ष्मी पुरी ने UN Women के संस्थापक डिप्टी कार्यकारी निदेशक के रूप में स्टीनम के साथ काम किया। उन्होंने देखा कि स्टीनम का घर भारतीय कला और वैश्विक भगिनीत्व (Sisterhood) के रंगों से भरा था। उन्होंने 'मिशन पॉसिबल' के माध्यम से लैंगिक समानता के लक्ष्य को आगे बढ़ाया। आज के दौर में, जहाँ स्त्री-द्वेष (Misogyny) के नए तरीके सामने आ रहे हैं और शारीरिक स्वायत्तता पर फिर से हमले हो रहे हैं, स्टीनम की विरासत और भी महत्वपूर्ण हो गई है।
प्रश्न 1: ग्लोरिया स्टीनम ने नारीवाद को कैसे परिभाषित किया?
उन्होंने नारीवाद को एक ऐसी सोच के रूप में परिभाषित किया जो पुरुषों और महिलाओं दोनों की मानवता और समानता को मान्यता देती है।
प्रश्न 2: भारतीय नारीवाद और पश्चिमी नारीवाद में क्या संबंध है?
यद्यपि पश्चिमी विचारकों का प्रभाव रहा, लेकिन भारतीय नारीवाद की अपनी जड़ें सावित्रीबाई फुले और रानी लक्ष्मीबाई जैसी स्थानीय नायिकाओं के संघर्षों में निहित हैं।