यह लेख इस बात का विश्लेषण करता है कि कैसे आज के दौर में पुस्तकों को दो अलग-अलग तरीकों से नष्ट किया जा रहा है—एक तरफ वैचारिक घृणा है, तो दूसरी तरफ एआई कंपनियों द्वारा डेटा माइनिंग के लिए किया जा रहा भौतिक विनाश।
- अहमदाबाद में कट्टरपंथियों द्वारा मलाला यूसुफजई और ऐन फ्रैंक की पुस्तकों को फाड़ना वैचारिक सेंसरशिप का उदाहरण है।
- AI कंपनियां कॉपीराइट से बचने के लिए दुर्लभ पुस्तकों को खरीदकर उन्हें स्कैन करने के बाद नष्ट (pulp) कर रही हैं।
- पुस्तकों का भौतिक अस्तित्व केवल कागज नहीं, बल्कि मानवीय सभ्यता और यादों का सांस्कृतिक भंडार है।
हाल ही में अहमदाबाद में एक विचलित करने वाली घटना सामने आई, जहाँ नागरिकों के एक समूह ने मलाला यूसुफजई और ऐन फ्रैंक की पुस्तकें पढ़कर विरोध प्रदर्शन किया। इस समूह का उद्देश्य उन संगठनों के खिलाफ आवाज उठाना था जिन्होंने स्कूलों से इन लेखिकाओं की पुस्तकों को हटाने का दबाव बनाया था। हालांकि, इस शांतिपूर्ण विरोध का अंत हिंसक हुआ जब बजरंग दल के सदस्यों ने वहां पहुंचकर न केवल लोगों के साथ मारपीट की, बल्कि पुस्तकों को बेरहमी से फाड़ दिया।
पुस्तकों को निशाना बनाना कोई नई बात नहीं है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी राज्य की विचारधारा को थोपना होता है या असहज सत्यों को दबाना होता है, तब किताबों को जलाना, प्रतिबंधित करना या उन्हें नष्ट करना सबसे आसान हथियार रहा है। लेकिन वर्तमान समय में पुस्तकों के विनाश का एक नया और अधिक सूक्ष्म रूप सामने आया है, जो वैचारिक नहीं बल्कि व्यावसायिक है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दुर्लभ पुस्तकों की बिक्री में अचानक वृद्धि देखी गई है। लेकिन ये खरीदार कोई संग्राहक या विद्वान नहीं, बल्कि 'रेड स्पैरो' और 'ब्लू फिंच' जैसे संदिग्ध नामों वाले प्रोजेक्ट्स हैं। इनका उद्देश्य इन पुस्तकों को ChatGPT जैसे लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) को प्रशिक्षित करने के लिए उपयोग करना है। इन कंपनियों ने पुस्तकों को खरीदा, उनके पन्नों को स्कैन किया और फिर उन्हें नष्ट कर दिया ताकि उन्हें ई-बुक्स या कॉपीराइट के कानूनी झंझटों का सामना न करना पड़े।
BozokMedia analysis shows that we are witnessing a dangerous shift in how human knowledge is valued. While the first group destroys books to kill an idea, the second group destroys the physical book to commoditize the idea. In both cases, the 'sanctity' of the book as a cultural object is ignored. The legal interpretation of "fair use" is being stretched to allow corporations to strip-mine human creativity without compensation.
"जब एक पुस्तक को केवल डेटा के स्रोत के रूप में देखा जाता है, तो हम उस मानवीय स्पर्श और इतिहास को खो देते हैं जो केवल एक भौतिक पुस्तक में निहित होता है।"
पुस्तकों का महत्व केवल उनमें लिखे शब्दों तक सीमित नहीं है। एक बच्चे के लिए किताब कल्पना की दुनिया का द्वार होती है, तो किसी मित्र द्वारा दी गई किताब एक मधुर स्मृति। दुर्लभ पुस्तकों की दुकानों से खरीदी गई किताबें इतिहास की परतों को समेटे होती हैं। ये केवल कागज और स्याही नहीं, बल्कि हमारी भावनाओं और विचारों का भौतिक प्रकटीकरण हैं।
इतिहास में पुस्तकों की रक्षा के लिए किए गए संघर्ष प्रेरणादायक रहे हैं। 1992 में बोस्निया और हर्जेगोविना की लाइब्रेरी को बचाने के लिए लाइब्रेरियन ने मानव श्रृंखला बनाई थी। नाजी जर्मनी में 'पेपर ब्रिगेड' ने अपनी जान जोखिम में डालकर किताबों को छिपाया था। सोवियत संघ में 'सामिज़्दाट' के माध्यम से प्रतिबंधित ग्रंथों को गुप्त रूप से प्रसारित किया गया था।
प्रश्न 1: AI कंपनियां पुस्तकों को नष्ट क्यों कर रही हैं?
उत्तर: वे पुस्तकों को स्कैन करके उनका डेटा अपने मॉडल में डालते हैं और फिर भौतिक प्रतियों को नष्ट कर देते हैं ताकि कॉपीराइट विवादों और ई-बुक लाइसेंसिंग की जटिलताओं से बचा जा सके।
उत्तर: विवाद यह है कि क्या किसी कंपनी द्वारा कॉपीराइट सामग्री को AI प्रशिक्षण के लिए उपयोग करना 'उचित उपयोग' के दायरे में आता है, खासकर तब जब मूल लेखक को कोई मुआवजा न मिले।