मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की बरसी पर उनके भाई अमरजीत सिंह ने सभी राजनीतिक दलों पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव नजदीक आते ही दल केवल वोट बैंक के लिए खालरा के नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं।
- जसवंत सिंह खालरा की हिरासत में मौत को 31 वर्ष पूरे हो गए हैं।
- उनके भाई अमरजीत सिंह ने राजनीतिक दलों पर चुनावी लाभ के लिए शोषण का आरोप लगाया।
- हाल ही में उनकी बायोपिक 'सतलुज' पर लगे प्रतिबंध ने विवाद को और बढ़ा दिया है।
पंजाब के प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की हिरासत में हुई हत्या को इस सप्ताह 31 वर्ष पूरे हो गए हैं। खालरा, जिन्होंने पंजाब पुलिस द्वारा किए गए फर्जी मुठभेड़ों और युवाओं के अवैध दाह संस्कार के मामलों को उजागर किया था, को 6 सितंबर 1995 को अमृतसर स्थित उनके घर से उठा लिया गया था।
हाल ही में, भारत सरकार द्वारा उनकी बायोपिक 'सतलुज' (Satluj) पर लगाए गए प्रतिबंध ने पंजाब में एक राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। इस विवाद ने आम आदमी पार्टी (AAP), कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू कर दिया है। सभी दल एक-दूसरे पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के पीड़ितों को न्याय दिलाने में विफल रहने का आरोप लगा रहे हैं।
राजनीतिक दलों का दोहरा चरित्र
यूके में रह रहे खालरा के भाई, अमरजीत सिंह खालरा ने एक विशेष साक्षात्कार में खुलासा किया कि राजनीतिक दल केवल 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों को देखते हुए अचानक अपने भाई को याद कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "31 वर्षों तक किसी ने उन्हें याद नहीं किया, लेकिन अब जब चुनाव करीब हैं, तो सभी दल उनके नाम का उपयोग वोट पाने के लिए कर रहे हैं।"
अमरजीत सिंह के अनुसार, खालरा की विचारधारा किसी एक दल तक सीमित नहीं थी। उन्होंने गरीबों के लिए आवाज उठाई, नक्सली आंदोलन में सक्रिय रहे और अन्याय के खिलाफ खड़े हुए। उन्होंने न केवल पुलिस की बर्बरता का विरोध किया, बल्कि आतंकवादियों द्वारा निर्दोषों की हत्या की भी निंदा की।
राजनीतिक दल इतने भ्रष्ट हैं कि वे कभी भी किसी जननायक को उभरते हुए नहीं देखना चाहते।
क्यों मायने रखता है यह मुद्दा?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि खालरा का मामला केवल एक व्यक्ति की मृत्यु का नहीं, बल्कि पंजाब के उस दौर का प्रतीक है जहाँ राज्य व्यवस्था और मानवाधिकारों के बीच गहरा संघर्ष था। बायोपिक पर प्रतिबंध यह दर्शाता है कि सत्ता अभी भी उस इतिहास को दबाने की कोशिश कर रही है जो वर्तमान व्यवस्था पर सवाल उठा सकता है।
अमरजीत सिंह ने कड़े शब्दों में कहा कि खालरा की मौत के समय वे अकाली दल का हिस्सा थे, फिर भी पार्टी ने 31 वर्षों तक उनके लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने भाजपा द्वारा फिल्म पर प्रतिबंध और कांग्रेस व AAP के मौन पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।
Frequently Asked Questions
1. जसवंत सिंह खालरा कौन थे?
वह एक प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता थे जिन्होंने पंजाब में पुलिस द्वारा किए गए फर्जी मुठभेड़ों और गायब हुए लोगों के मामलों को उजागर किया था।
2. 'सतलुज' फिल्म विवाद क्या है?
'सतलुज' खालरा के जीवन पर आधारित एक बायोपिक है जिसे सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया है, जिससे पंजाब में राजनीतिक विवाद छिड़ गया है।