मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै बेंच ने शिवगंगा जिले में भूजल स्तर को गिराने वाले अनधिकृत पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर प्लांट को स्थायी रूप से बंद करने की मांग वाली याचिका पर राज्य सरकार से जवाब मांगा है।
- मद्रास उच्च न्यायालय ने शिवगंगा में अवैध जल संयंत्रों को सील करने पर सरकार से जवाब मांगा है।
- याचिका में भूजल की विनाशकारी कमी और मिट्टी के क्षरण का मुद्दा उठाया गया है।
- अवैध निष्कर्षण के कारण ग्रामीण कुओं में खारे पानी और जहरीले नाइट्रेट का स्तर बढ़ गया है।
मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै बेंच ने शिवगंगा जिले में गहराते जल संकट पर कड़ा रुख अपनाया है। सोमवार को जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. सखतिवेल की खंडपीठ ने इलयांगुडी के पी. राधाकृष्णन द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर राज्य सरकार से जवाब मांगा है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि अनधिकृत पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर प्लांट, वाणिज्यिक खनिज जल इकाइयों और कच्चे पानी के निष्कर्षण बिंदुओं की बढ़ती संख्या ने एक पहले से ही नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को विनाश के कगार पर धकेल दिया है। शिवगंगा को एक कृषि रूप से संवेदनशील और सूखा प्रवण क्षेत्र बताया गया है, जहाँ मिट्टी की प्रतिकूल संरचना और अनियमित मानसून पहले से ही पानी की भारी कमी पैदा करते हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला वाणिज्यिक लाभ और पारिस्थितिक अस्तित्व के बीच बढ़ते संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है। जब बिना लाइसेंस वाली इकाइयां प्राकृतिक पुनर्भरण (recharge) की तुलना में कहीं अधिक दर से भूजल निकालती हैं, तो वे प्रभावी रूप से ग्रामीण गरीबों और किसानों से पानी 'चुरा' रही होती हैं। शिवगंगा में, घनी क्ले लोम सतह की मिट्टी बारिश के पानी के रिसाव को रोकती है, जिससे भूजल स्तर में स्थायी गिरावट आती है।
"सूखा प्रवण क्षेत्रों में पानी जैसे बुनियादी मानवाधिकार का व्यवसायीकरण एक्विफर के अपरिवर्तनीय पतन और प्रणालीगत कृषि विफलता की ओर ले जाता है।"
याचिकाकर्ता ने विशेष हाइड्रो-जियोकेमिकल परीक्षणों के आधार पर चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं। याचिका के अनुसार, इन वाणिज्यिक सुविधाओं के आसपास के कुओं में जल स्तर में भारी गिरावट आई है और गहरा खारा पानी ऊपर आ गया है। इसके अलावा, नाइट्रेट की अधिकता और तेजी से भूमि क्षरण के सबूत मिले हैं, जिससे उपजाऊ खेत बंजर हो रहे हैं।
यह कानूनी चुनौती केंद्रीय भूजल बोर्ड (Central Ground Water Board) के आधिकारिक प्रकाशनों पर आधारित है। इन दस्तावेजों की पुष्टि है कि शिवगंगा का भूगर्भीय ढांचा इसे भूजल निष्कर्षण के प्रति अत्यंत संवेदनशील बनाता है। याचिका में दावा किया गया है कि पीने योग्य ताजे पानी को रासायनिक रूप से खारे पानी में बदला जा रहा है, जो मानव उपभोग या कृषि के लिए अनुपयुक्त है।
अदालत ने अब इस मामले की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर के लिए तय की है, जिससे यह निर्धारित होगा कि राज्य सरकार जिले के शेष जल संसाधनों की रक्षा के लिए इन अनधिकृत इकाइयों को सील करने की दिशा में निर्णायक कार्रवाई करेगी या नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: शिवगंगा जिला विशेष रूप से संवेदनशील क्यों है?
इसकी घनी क्ले लोम मिट्टी के कारण, बारिश का पानी आसानी से जमीन के अंदर नहीं जा पाता, जिससे अन्य क्षेत्रों की तुलना में प्राकृतिक रिचार्ज दर बहुत धीमी होती है।
प्रश्न 2: याचिका में किन स्वास्थ्य जोखिमों का उल्लेख किया गया है?
याचिका में जहरीले नाइट्रेट और फ्लोराइड के संचय के साथ-साथ अत्यधिक खारेपन का उल्लेख है, जिससे पानी मानव उपभोग के लिए असुरक्षित हो गया है।