कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवाकुमार ने कलाबुरगी में स्थित ख्वाजा बंदा नवाज़ दरगाह में सैयद मोहम्मद गेसु दराज़ रिसर्च अकादमी का औपचारिक उद्घाटन किया। यह संस्थान दक्कन के प्रमुख सूफ़ी संत की जीवन‑धरोहर, शिक्षाओं और दुर्लभ पांडुलिपियों को संरक्षित, शोध और प्रसार करने के लिए स्थापित किया गया है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवाकुमार ने 7 जुलाई, 2026 को कलाबुरगी में स्थित ख्वाजा बंदा नवाज़ दरगाह के परिसर में सैयद मोहम्मद गेसु दराज़ रिसर्च अकादमी का उद्घाटन किया। यह पहल राज्य सरकार की सांस्कृतिक विरासत संरक्षण की प्रतिबद्धता को दर्शाती है और दक्कन के सूफ़ी इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण कदम है।

पृष्ठभूमि और अवधारणा

अकादमी का विचार मूल रूप से दिवंगत हजूर शेख सैयद शह मोहम्मद अल‑हुसैनी ने प्रस्तुत किया था, जबकि इसे साकार करने का कार्य बाद में दिवंगत हजूर सैयद शह गेसु दराज़ खुर्सो हुसैनी ने आगे बढ़ाया। दोनों विद्वानों ने ख्वाजा बंदा नवाज़ की आध्यात्मिक और साहित्यिक धरोहर को संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे यह संस्थान आज की वास्तविकता बन पाया।

अकादमी के उद्देश्य

अकादमी तीन मुख्य स्तंभों पर कार्य करती है: (i) दुर्लभ पांडुलिपियों और ग्रंथों का संग्रह, (ii) उनका अनुवाद एवं डिजिटलकरण, और (iii) शोध एवं शैक्षणिक सहयोग को बढ़ावा देना। संस्थान के निदेशक प्रो. मोहम्मद मुस्तफा शरिफ़ ने बताया कि वे विश्वभर से ख्वाजा बंदा नवाज़ की लिखित कृतियों को इकट्ठा कर कई भाषाओं में अनुवाद कर रहे हैं, ताकि शोधकर्ता, छात्र और आम जनता इन तक आसानी से पहुँच सकें।

वर्तमान संग्रह और चल रहे प्रोजेक्ट

अकादमी ने अब तक 500 से अधिक दुर्लभ पांडुलिपियों और 30 से अधिक मूल ग्रंथों को संरक्षित किया है। इनमें अरबी, फ़ारसी, दक्कनी उर्दू में लिखे हुए हस्तलिखित दस्तावेज़, साथ ही रेशमी कपड़े पर लिखी हुई कुरान की एक अनोखी प्रतिलिपि शामिल है। प्रमुख शोध प्रोजेक्टों में अस्मर‑उल‑अस्रर, सिर्र‑ए‑मुहम्मदी, मक्तुबात‑ए‑बंदा नवाज़ और माअरिफ‑उल‑अवारिफ जैसे सूफ़ी ग्रंथों का अनुवाद व टिप्पणी शामिल है।

भविष्य की दिशा

उद्घाटन समारोह में उपमुख्यमंत्री जी. परमेेश्वर, स्वास्थ्य मंत्री यू.टी. ख़ादर और कई वरिष्ठ官官 उपस्थित थे। मुख्यमंत्री शिवाकुमार ने राज्य सरकार से अकादमी को निरंतर वित्तीय एवं प्रशासनिक समर्थन देने का आश्वासन दिया, यह कहा कि यह संस्था दक्कन की सूफ़ी परम्परा को भविष्य में भी जीवंत रखने में अहम भूमिका निभाएगी।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

दक्कन के सूफ़ी इतिहास को संरक्षित करना न केवल क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचान को सुदृढ़ करता है, बल्कि भारत के बहु‑धर्मीय सामाजिक ताने‑बाने को भी समृद्ध बनाता है। अकादमी के माध्यम से विश्व भर के विद्वानों को इस विरासत तक पहुँच मिलती है, जिससे अंतर‑सांस्कृतिक संवाद को नई ऊर्जा मिलती है।