पिटरबरो सिटी काउंसिल ने हाई कोर्ट में बताया कि हिंदू मंदिर को एक मुस्लिम संस्था को बेचने का फैसला गैर‑क़ानूनी नहीं है। हिंदू समुदाय ने इस निर्णय को अनुचित मूल्यांकन और धार्मिक अधिकारों की अनदेखी बताया, जबकि परिषद वित्तीय दबाव का हवाला देती है। भारत हिंदू समाज न्यायिक समीक्षा के माध्यम से इस फैसले को रद्द करवाने की कोशिश कर रहा है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- पिटरबरो परिषद ने मंदिर की बिक्री को गैर‑क़ानूनी नहीं कहा।
- हिंदू समुदाय ने वैकल्पिक स्थानों की कम कीमत को अस्वीकार किया।
- बिल्डिंग की कीमत पर विवाद, वित्तीय जरूरतें और धार्मिक संरक्षण प्रमुख कारक।
पिटरबरो सिटी काउंसिल ने लंदन के हाई कोर्ट में यह स्पष्ट किया कि न्यू इंग्लैंड कॉम्प्लेक्स को यूके इस्लामिक मिशन (UKIM) को बेचने का उनका निर्णय “क़ानूनी” है। यह परिसर वर्तमान में भारत हिंदू समाज (BHS) द्वारा 1986 से किराए पर लिया गया है और यहाँ एक हिंदू मंदिर स्थित है, जो 35‑मील के दायरे में एकमात्र पूजा स्थल है।
कानूनी पृष्ठभूमि और समानता दायित्व
परिषद के वकील कैथरीन रोवलैंड्स ने कहा कि जबकि हिंदू धर्म एक संरक्षित विशेषता है, यह निर्णय‑लेने की प्रक्रिया को “निर्देशित” नहीं करता। इंग्लैंड और वेल्स के समानता अधिनियम 2010 के तहत सार्वजनिक संस्थाओं को धार्मिक समूहों को असमान नहीं करना चाहिए, परन्तु यह “निर्णय को बाध्य” नहीं करता। इस तर्क को सुनते ही कई हिंदू दर्शकों ने “जय श्री राम” वाले नारंगी टी‑शर्ट पहने हुए प्रकट होकर असंतोष व्यक्त किया।
वित्तीय दबाव और प्रस्तावित ऑफ़र
UKIM ने इस साइट के लिए £1.4 मिलियन (लगभग ₹18 करोड़) की बोली लगाई, जबकि BHS ने £900,000 (₹11.5 करोड़) के साथ अतिरिक्त सामाजिक मूल्य के रूप में ₹6.4 करोड़ का प्रस्ताव दिया। परिषद ने बताया कि “पिटरबरो परिषद को वित्तीय मदद की आवश्यकता है”, जिससे इस सौदे को आर्थिक दृष्टिकोण से समझाया गया। न्यायाधीश मोरिस ने पूछा कि यदि UKIM ने 2035 के लक्ष्य के लिए अभी फंड नहीं जुटाया तो क्या यह निर्णय उचित है, परन्तु परिषद ने “वित्तीय लक्ष्य अगले हफ्ते भी पूरा हो सकता है” जैसा उत्तर दिया।
समुदाय की प्रतिक्रिया और भविष्य की कार्रवाई
हिंदू समुदाय ने इस निर्णय को “अन्यायपूर्ण” कहा, यह तर्क देते हुए कि उनके पास वैकल्पिक स्थानों के लिए पर्याप्त बजट नहीं है। BHS ने इस फैसले को रद्द करने के लिये न्यायिक समीक्षा का अनुरोध किया है, जिससे अदालत से इस बिक्री को निरस्त करने की मांग की गई है। यदि न्यायिक समीक्षा सफल होती है, तो यह स्थानीय सरकारों द्वारा धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित कर सकता है।
संभावित नतीजे और राष्ट्रीय प्रभाव
यह विवाद सिर्फ पिटरबरो तक सीमित नहीं रहेगा; यह यूके में धार्मिक संपत्तियों के अधिकार, सार्वजनिक निधि की उपयोगिता और सामुदायिक समानता के व्यापक मुद्दों को उजागर करता है। यदि अदालत निर्णय बदलती है, तो अन्य स्थानीय निकायों को भी समान मामलों में सावधानी बरतनी पड़ेगी, जिससे बहु‑धर्मीय सहअस्तित्व की नीति पर पुनर्विचार आवश्यक हो सकता है।